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Monday, December 13, 2010
देश का अपमान, फिर भी हमारे नेताजी महान !
10:37 PM
आज कल कांग्रेस पार्टी के नेताओं की मनोदशा दिन पर दिन बिगड़ती ही जा रही है। कांग्रेस के बड़े बड़े महारथी लगातार धर्म,आतंकवाद पर गैर जरूरी बयान देकर देश के लोगों को गुमराह करने में लगे हुए हैं। जिससे अराजकता का महौल पैदा हो रहा है। अपराध हो या आतंकवाद दोनों पर लगाम लगाने की बजाय जनता को मूर्ख बनाकर भ्रष्टाचार के गंभीर मुद्दों से भटकाया जा रहा है। मंत्री हो या महासचिव सभी ने ठान ली है कि काम नहीं करेंगे सिर्फ बयान देंगे। जिससे भ्रष्टाचार में फंसी कांग्रेस सरकार को कुछ तो राहत दे सकें। अपराधियों और आतंकियों को प्रोमोशन दे रही सरकार के बेलगाम होते मंत्री अपने बयानों में अब देश को तोडने वाली भाषा इस्तेमाल भी कर रहे हैं।कांग्रेसी नेताओं ने आतंकवाद और अपराधीकरण पर औने-पौने बयान देकर इनकी परिभाषाएं ही बदल दी हैं। ऐसे ही कुछ किया है वरिष्ठ कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह और गृहमंत्री चिदंबरम ने जो कि देश विरोधी बयान देने के मामले में बुरी तरह फंस गए हैं।
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| दिग्गी राजा इस बार बुरे फंसे हैं, कहीं पार्टी से हाथ ना धो बैठें |
दिग्विजय सिंह ने मुंबई हमले में मारे गए शहीद हेमंत करकरे पर दिए बयान में कहा-“हेमंत करकरे को हिंदू आतंकवादियों से बड़ा खतरा था। मुंबई हमले के कुछ घंटे पहले मेरी उनसे बात हुई थी, लेकिन रिपोर्ट में कहा गया की पाकिस्तानी आतंकियों की गोली मारी”।दिग्विजय सिंह जैसे नेता जिनके विवादास्पद बयानों से कांग्रेस को कई बार शर्मिंदा होना पड़ा है इस बार भी कांग्रेस ने उनका निजी बयान बताकर पल्ला झाड़ लिया लेकिन दिग्गी राजा तो अड़े हुए हैं। सबूत देने की बात कर रहे हैं। लेकिन सवाल ये उठता है उन्होंने कैसे इस बात को 2 साल तक पचाए रखा।
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| शहीद एटीएस चीफ हेमंत करकरे की पत्नी |
दिग्विजय ने मुंबई हमले की याद फिर ताजा करके शहीद करकरे की विधवा पर सैंकड़ों तीरों की तरह वार किए हैं,बजाय माफी मांगने के दिग्विजय सिंह ने बीजेपी पर ही आरोप जड़ दिए। बात सही है कांग्रेस का पुराना चलन है,चोरी तो चोरी ऊपर से सीना जोरी...। क्या ये आतंकवाद का धर्मों में बंटवारा करके देश को बांटने की ओर इशारा है या फिर सुर्खियों बने रहने के लिए एक मनगढ़ंत कहानी है। करकरे पर बयान देना दिग्गी राजा के लिए कितना खतरनाक साबित होता है ये तो आनेवाला वक्त ही बताएगा लेकिन दिग्विजय साहब को देश की जनता को ये बताना होगा कि हिंदु आतंकवाद क्या होता है, मुस्लिम, सिख और ईसाई आतंकवाद क्या होता है।
खैर की क्या कहें हमारे गृह मंत्री का भी हाल यही है...चिदंबरम को मुंबई में हमले के बाद गृह मंत्री की गद्दी दी गई थी। जनता को शिवराज पाटिल जैसे वीआईपी गृह मंत्री की नाकामी के बाद चिदंबरम से काफी कुछ उम्मीदें थीं। लेकिन चिदंबरम भी देश को जोड़ने के बजाय तोड़ने वाले बयान दे रहे है।
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| शर्मसार होती देश की राजधानी |
दिल्ली में बढ़ते अपराध को रोकने में नाकाम चिदंबरम साहब ने जनता पर ही धावा बोल दिया। जिसकी सुरक्षा व्यवस्था की जिम्मेदारी स्वयं उनके मंत्रालय की है। अपने बयान में कहा..“दिल्ली में बाहर आए लोग अनाधिकृत कॉलोनियों में बस गए है वही दिल्ली में अपराध कर रहे हैं”। इस बयान के बाद पूरे देश चिदंबरम की ऐसी भद्द पिटी जिसके बाद उन्हे 3 घंटों के भीतर उनकी ओर बयान वापस लेने की खबर आ गई।
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| बोलती बंद.. गृह मंत्री कह रहे हैं अब कभी कुछ नहीं बोलूंगा |
विपक्ष और सत्ता पक्ष के भारी विरोध के चलते चिदंबरम ने अपने दूसरे बयान में कहा- मैं भी बाहर से आया हूं, मेरे बयान को तोड़ मरोड़ कर पेश किया गया। वाह चिदंबरम साहब दिल्ली में पूरे भारत से लोग आते हैं और देश की राजधानी पर पूरे देश का हक है। राजधानी की सुरक्षा क्या केवल विदेशियों के लिए है जो कि सिर्फ कॉमनवेल्थ में ही दिखाई पड़ी थी। क्या राजधानी के लिए सुरक्षा के नियम इतने सख्त नहीं होने चाहिए कि परिंदा भी पर ना मार सके। लेकिन आप तो उलटे जनता पर ही चढ़ गए।राजधानी में सुरक्षा तंत्र बूढ़ा हो चुका और टूटी खाट पर लेटकर पानी मांग रहा है। लगातार हो रहे गैंगरेप,मर्डर चोरियों से दिल्ली पुलिस के काम करने के तरीके पर सवालिया निशान लगा दिया है ऐसे में कोई आतंकी हमला हो जाता है तो कोई बड़ी बात नहीं होगी। इससे पहले भी दिल्ली की मुख्यमंत्री और शीला दीक्षित और राज्यपाल तेंजेंदर खन्ना भी गृह मंत्री जैसे ही बयानों की दौड़ में शामिल हो चुके हैं।
क्या देश का कानून ऐसे जिम्मेदार मंत्री और नेताओं के खिलाफ कुछ नहीं कर सकता। क्या ऐसे बयानों पर इनके खिलाफ कानूनी कार्यवाही नहीं करनी चाहिए। लेकिन सरकार को देश की एकता और अखंडता से लगाव नहीं और ना ही शासन चलाने की मंशा तभी तो हुर्रियत नेता गिलानी और अरूंधति रॉय के कश्मीर पर दिए देश विरोधी बयानों में सरकार को कुछ गलत दिखाई नहीं दिया। वहीं अफजल गुरू की फाइल लटका कर उसे फांसी पर लटकने नहीं दे रही है।
अब ये तस्वीर बिल्कुल साफ हो चली है कि सरकार नाकारा है। सत्ता में बने रहने के लिए आम लोगों की बलि चढ़वा रही है। अपनी अक्षमता से सरकार ने विपक्ष एकजुट होने में खूब मदद की है जो सरकार को किसी भी मुद्दों पर पछाड़ने के लिए तैयार बैठी है। इन नेताओं के बयानों से कहीं इतने हालात न बिगड़ जाएं कि ये दशकों तक सत्ता को सुख न भोग पाए। राजनीति के इन महान नेताओं देश की जनता का अपमान का कोई हक नहीं बनता ऐसे नेता दोबारा सत्ता में न आ पाए जिसके लिए हम,आपको ही प्रयास करने होंगे।
Thursday, September 9, 2010
कहिए प्रधानमंत्री जी कब इस्तीफा दे रहे हैं ?
7:59 PM
जयपुर के एक गांव फागी में सरकारी कंपनी बीएसएनएल ने 1हजार बीपीएल परिवारों को मुफ्त मोबाइल बांटे। लेकिन राजस्थान सरकार ने इन्हीं बीपीएल परिवारों को मिलने वाले गेहूं का कोटा 35 किलो से घटाकर 25 किलो कर दिया। जरूरत अनाज की थी लेकिन सरकार को लगता है इन लोगों को रोटी से ज्यादा मोबाइल की जरूरत है। राज्य में बीपीएल धारकों की संख्या 24 लाख है, फिर सरकार ने केवल 1हजार लोगों को ही मुफ्त मोबाइल क्यों बांटे। बीपीएल परिवारों को बांटे गए मोबाइल का उपयोग वे कितना कर पाते हैं ये तो वक्त ही बताएगा लेकिन गरीबी दूर करने के सरकार के ऐसे प्रयासों से तो ऐसा ही लगता है कि सरकार गरीबी का केवल मजाक उड़ा रही है।
संसद में पक्ष-विपक्ष का काम एक दूसरे पर आऱोप लगाना और छींटाकशी करना रह गया है, लेकिन सदन के बाहर भी ये जन प्रतिनिधि मौके नहीं चूकते और गाहे बगाहे मीडिया के सामने अपनी भड़ास मिटाते रहते हैं। ऐसे ही एक टीवी शो में सीपीआई नेता अतुल अंजान ने सरकार को गैर पढ़े लिखों की जमात कह दिया, ये बयान ज्यादा सुर्खियां तो नहीं बटोर सका लेकिन केंद्र को एक आईना जरूर दिखा दिया। भंडारण की कमी का रोना रो रही केंद्र सरकार को सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था “यदि अनाज को रखने की जगह नहीं है सड़ाने से अच्छा है गरीबों में बांट दिया जाए”। लेकिन केंद्र के बिजी मंत्री शरद पवार को सुप्रीम कोर्ट का आदेश,आदेश नहीं सलाह लगी। शरद पवार कन्फ्यूज हो गए और कह दिया,“सुप्रीम कोर्ट ने हमें सुझाव दिया है,ऐसा करना आसान नहीं है”। जब कार्यवाही नहीं हुई तो सुप्रीम कोर्ट ने फिर सरकार को डांट पिलाई। लेकिन सरकार डांट खाने के बाद भी सरकार नहीं सुधरी...अबकी बार मैदान में स्वयं पीएम उतर गए। मनमोहन सिंह ने कहा कि “अनाज गरीब परिवारों में नहीं बांटा जा सकता,न्यायपालिका सरकार की नीतियों में दखल न दे”। बिल्कुल सही कहा..कानून बनाने वालों को कोई कानून सिखाए तो गुस्सा तो आएगा ही,अनाज मत लो मोबाइल ले लो,मोबाइल से बात करोगे तो पेट भर जाएगा। फिर महंगाई के मुद्दे पर बोले प्रधानमंत्री, “मुझे नहीं पता महंगाई कब कम होगी मैं कोई ज्योतिष नहीं हूं” अरे भाई आप ज्योतिष नहीं है तो सरकार क्यों चला रहे हैं। हमारे देश में लोग प्रधानमंत्री को किसी ज्योतिष से कम नहीं समझते हैं जिसे सब कुछ पता होता। है।
सरकार दिन पर दिन असंवेदनशील होती जा रही है, मंत्रियों की बातें तो बेलगाम थी हीं. अब पीएम भी इस वाकयुद्ध में कूद पड़े हैं। कॉमनवेल्थ में घोटाले का दंश,कश्मीर में विद्रोह और महंगाई से हार चुकी सरकार को अपना भविष्य अंधकारमय नजर आ रहा है। सरकार के मंत्री अपनी शर्तों पर काम करते हुए औने पौने बयान दे रहे हैं,मंत्रियों के लिए कभी भगवा रंग आतंक का पर्याय बन जाता है तो कभी हार्डकोर नक्सली के मारे जाने की जांच की बात कही जाती है। दोहरे चरित्र वाली सरकार ने आईपीएल में नाम आने पर थरूर को थलग कर दिया लेकिन घोटालों के महाराजा ए.राजा का पावर अभी भी बरकरार रखा है। यूपीए अध्यक्ष कहती है किसानों के हितों का ख्याल रखा जाए। लेकिन कैसे, जिस किसान का कोई खैरख्वाह नहीं, उस की जमीन पर राजनीति हो रही है उसकी जमीन छीनकर उसे जबर्दस्ती करोड़पति बनाया जा रहा हैं सरकार के पास अब मुद्दे नहीं हैं किस मुंह से बिहार,बंगाल चुनाव लड़ेगी पता नहीं। सरकारी योजनाओं में भ्रष्टाचार चरम पर है,सरकारी नीतियां खोखली साबित हो रही है,खाद्यान्न बढ़ रहा है,साथ-साथ महंगाई की मार भी बढ़ी है। बिचौलियों के हाथों की कठपुतली बन चुकी सरकार के पास खुद बचाने का छोड़ो भागने का भी रास्ते नहीं बचा है। हमारे शांत स्वभावी अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री की नीतियां गड़बड़ा रही हैं क्या यही उनकी बौखलाहट का कारण भी बन रही है। ऐसे वक्त में ये बात मनमोहन सिंह के लिए बिल्कुल फिट बैठती नजर आती है... कहिए प्रधानमंत्री जी कब इस्तीफा दे रहे हैं।
Tuesday, August 31, 2010
आतंकवाद का बंटवारा !!
4:02 PM
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| गृहमंत्री का बयान- भारत में भगवा आतंकवाद फैल रहा है |
भारत के लोगों ने कई बंटवारे देखे है, पहले देश को 2 भागों में बंटता हुआ देखा, फिर राज्यों के कई टुकड़े होते हुए देखे, फिर आरक्षण की आग से युवाओं के दिलों को बंटते हुए देखा। लेकिन अब एक नया बंटवारा सामने आया है,आतंकवाद का बंटवारा। बात ज्यादा पुरानी नहीं है मालेगांव और समझौता एक्सप्रेस धमाकों समेत कुछ अन्य वारदातों में कुछ संगठनों के शामिल होने की बात सामने आई थी। कुछ लोगों ने इसे हिंदू आतंकवाद का नाम दिया था। आतंकवाद के कई स्वरूप और नाम सामने आ रहे हैं। ऐसे में आतंकवाद का इंडेक्स बनाना सरकार की जिम्मेदारी थी और इसको सरकार के मंत्री बखूबी निभा रहे हैं।
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| आतंकवाद को रंगों, धर्मों से जोड़ना कितना सही है? |
बात करें देश के गृह मंत्री पी चिदंबरम की तो उनका ये बयान, ‘‘भारत में युवकों और युवतियों को कट्टर बनाने के प्रयास बंद नहीं हुए हैं। हाल ही में हुए कई बम विस्फोटों से भगवा आतंकवाद का नया स्वरूप सामने आया है।’’ पर हंगामा बरपा हुआ है जो रुकने का नाम ही नहीं ले रहा। देश का गृह मंत्री जब अपनी वाक् बुद्धि छोड़ कर ऐसे बयान देने लग जाए तो देश का ध्रुवीकरण की ओर जाना तय सा लगता है। चिदंबरम के भगवा आतंकवाद पर बयान की चौतरफा आलोचना हो रही है। बीजेपी, शिवसेना समेत कई दलों ने इस मुद्दे पर लोगसभा की कार्यवाही मे २ दिनों तक अड़ंगा डाला और कड़ा विरोध सरकार जताकर प्रधानमंत्री से माफी मांगने तक की बात कह दी। इस मु्द्दे पर गुजरात में चिदंबरम के खिलाफ केस भी दर्ज कराया गया है।
भारत की आजादी का प्रतीक रहा केसरिया रंग को आज आतंकवाद का रंग कहकर उन शहीदों का अपमान किया है जिन्होंने देश के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। हालांकि चिदंबरम के इस बयान पर कुछ लोगों का मानना है कि चिदंबरम साहब ने ये सब किसी के विशेष व्यक्ति के कहने पर बोला है। बढ़ते भ्रष्टाचार और महंगाई कम न कर पाने का मलाल कर रही सरकार के असली मुद्दे जैसे कॉमनवेल्थ,नक्सल समस्या आदि से विपक्ष को भटकाना चाहती है। लेकिन कुछ राजनीतिक दलों ने चिदंबरम की टिप्पणी को सही ठहराया। ये वही दल है जो कहते रहते हैं आतंकवाद को किसी मजहब या किसी समुदाय से नहीं जोड़ा जाना चाहिए।
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| भारत में बेरोजगारी, भुखमरी दे रही है आतंकवाद को बढ़ावा |
किसी मंत्री ने बयान दिया और कांग्रेस ने बयान से पल्ला झाड़ लिया, ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। अपने मंत्रियों के बयानों से शर्मसार होती रही कांग्रेस के लिए अब ये आम बात या कहें मजबूरी बन चुकी है। “आतंकवाद का कोई रंग नहीं होता,शब्दों के चयन का ख्याल रखना चाहिए”। कांग्रेस नेता जनार्दन द्विवेदी ने ये बयान देकर चिदंबरम के बयान पर कांग्रेस की आपत्ति दर्ज करा दी। लेकिन सरकार के वरिष्ठ मंत्री को ऐसा बयान देने की आखिर क्या मजबूरी रही होगी। क्या देश की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था की समस्या इतनी गंभीर होती जा रही है जिससे चिदंबरम साहब खुद डर गए है।
नेताओं का राजनीतिक बयानबाजी न करना अपने पेशे से खिलाफत करने जैसा है। नेताओं के लिए आज देश से बढ़कर वोट बैंक राजनीति है। इसलिए समय समय पर वे विवादास्पद बयान देते रहते हैं।लेकिन मंत्रियों का ऐसा करना कहां तक उचित है, आतंकवाद को धर्मों और रंगों से जोड़ना कितना सही है?आतंकवाद की किसी भी चीज से तुलना करना सूक्ष्म मानसिकता का परिचायक है। आतंकवाद को बांटने वाला चिदंबरम का ये बयान कम से कम आतंकवाद या कट्टरवाद को रोकने में तो सफल नहीं हो सकता।
Wednesday, June 30, 2010
ग्लैमर का आखिरी सच...!
5:51 AM
फैशन की दुनिया काला सच एक बार फिर सामने आया, 1994 में कामसूत्र के विज्ञापन से पूरे देश मे तहलका मचा देने वाली पूर्व सुपर मॉडल विवेका बाबाजी ने अपने घर में फांसी लगाकर खुदकुशी कर ली। उनकी लाश मुंबई में बांद्रा स्थित उनके फ्लैट में पंखे से लटकती पाई गई। उनकी मौत फैशन इंडस्ट्री में किसी सनसनी से कम नहीं थी। ऐसा कहा जा रहा है गौतम से विवेका का ब्रेक अप हुआ था जिसके बाद विवेका डिप्रेशन में रहने लगी थीं।विवेका का पार्टनर कार्तिक का नाम भी इस मर्डर मिस्ट्री से जुड़ रहा है। मिस मॉरिशस रह चुकीं विवेका 90के दशक के शुरुआती वर्षों में मुंबई आईं और मॉडलिंग की दुनिया में छा गईं। उनका मॉ़डलिंग करियर बहुत ही शानदार रहा। हरभजन मान के बिल्लो गाने से लोगों ने उन्हें पर्दे पर पहचाना।फिल्म 'ये कैसी मुहबबत है' में उन्हें लीड रोल मिला। विवेका ने दक्षिण की कई फिल्मों में भी हाथ आजमाया। लेकिन फुल टाइम एक्ट्रेस नहीं बन सकीं।


एक समय ऐसा आया जब विवेका ने फैशन इंडस्ट्री को गुड बाय कह दिया था।पिछले साल वह वापस लौटी और अपनी एक इवेंट मैनेजमेंट कंपनी का काम शुरू किया था।
विवेका कई अनसुलझे सवाल छोड़ गईं है ऐसा क्या हुआ होगा जब उन्होंने अचानक ऐसा कदम उठाया। क्या उनको किसी ने उकसाया था, क्या उनका भी फैशन की दुनिया से मोह भंग हो गया था। क्या है विवेका की मौत का रहस्य कई सवालों के जबाव अभी आने बाकी है।लेकिन ग्लैमर और फैशन के पीछे का क्या सच यही है...कई फैशन इंडस्ट्री में कई ऐसी घटनाएं सामने आ चुकी हैं।
दुनिया भर में रैम्प पर मद मस्त कर देने वाले संगीत पर जलवे बिखेरती मॉडल्स सभी आकर्षित करती हैं। कंपटीशन के इस दौर में अपनी एक अलग छवि बनाने के लिए मॉडल्स कुछ भी कर गुजरते हैं।लेकिन इस चकाचौंध में कई चीजें छिप जाती और दुर्घटनाओं के रूप में सामनेआती हैं। इस श्रेणी में अकेली विवेका ही नहीं हैं। जुलाई 2004में एमटीवी की सबसे चर्चित वीजे और मॉडल नफीसा जोजफ ने भी मुंबई के अपने फ्लैट में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। नफीसा अपने व्यवसायी मित्र गौतम खंडुजा से शादी करने वाली थीं, लेकिन ये रिश्ता टूट गया। नफीसा सह नहीं सकी और आखिरकार डिप्रेशन में आकर खुदकुशी कर ली।विवेका कई अनसुलझे सवाल छोड़ गईं है ऐसा क्या हुआ होगा जब उन्होंने अचानक ऐसा कदम उठाया। क्या उनको किसी ने उकसाया था, क्या उनका भी फैशन की दुनिया से मोह भंग हो गया था। क्या है विवेका की मौत का रहस्य कई सवालों के जबाव अभी आने बाकी है।लेकिन ग्लैमर और फैशन के पीछे का क्या सच यही है...कई फैशन इंडस्ट्री में कई ऐसी घटनाएं सामने आ चुकी हैं।
इसके एक साल बाद ही टीवी सीरियल कैट्स से पहचान बनाने वाली मॉडल कुलजीत रंधावा ने भी आत्महत्या कर ली। ये सिलसिला यहीं नहीं रुका चित्रा सिंह की बेटी मोनिका चौधरी ने मई 2009 में अपने मुंबई के आवास में आत्महत्या कर ली थी। मोनिका अपने जमाने की मशहूर मॉडल थी। मोनिका की आत्महत्या के पीछे असफल रिश्तों को मुख्य वजह माना गया।मॉडलिंग में हर तरह से परफेक्ट लगने की चाहत भी कभी कभी ऐसी घटनाओं को अंजाम देती हैं।कई ऐसी मॉडल्स हैं जिनकी मौत का सच आज तक कोई नहीं जान सका। लेकिन शायद ग्लैमर का आखिरी अंजाम यही है ।विवेका का सच लोगों के सामने आ पाएगा ये वक्त से ही बता पाएगा लेकिन फैशन की ये दुनिया जितनी रंगीन दिखाई देती है उतनी ही रंगहीन भी है।
Monday, June 28, 2010
“घुटघुट कर जी रही जनता, घूंटघूंट पी रही सरकार” !
3:30 PM
ये तस्वीरें याद दिलाती है यूपीए सरकार में हुए घटनाक्रमों की... पिछले 6वर्षों से सत्ता का सुख भोग रही सरकार ने एक साल में चार बार तेल के दामों में वृद्धि करके आम आदमी की कमर तोड़ दीहै। हालिया बयान में वित्त मंत्री ने कहा है कि महंगाई अभी और बढ़ेगी। इन फैसलों से सरकार की तानाशाही नियति साफ नजर आ रही। पिछले कई सालों से लगातार महंगाई से जूझती जनता को इससे मुक्ति कब मिलेगी ये कहना नामुमकिन सा हो गया है। खाद्य पदार्थों से लेकर रोजमर्रा की वस्तुओं के लगातार दाम बढ़ने से आम आदमी नरकीय जीवन जीने को मजबूर है। उसे कहीं से भी उम्मीद की एक किरण नजर नहीं आ रही। गरीबी,महंगाई बेरोजगारी ने आज पूरे देश को जकड़ रखा है फिर भी सरकार नहीं चेत रही मनमानी किए जा रही है।
दोषी कौन है आज नगर हो, महानगर हो, कस्बा या गांव सभी जगह लोग त्रस्त हैं। शहरों में लोग बेबसी की जिंदगी जी रहे हैं। गांव में पनप रही बेरोजगारी को सरकार बेरोजगारी नहीं समझती इसलिए गांव के लोगों का शहरों में पलायन नहीं रोक पा रही। मनरेगा जैसी कई बड़ी योजनाएं भ्रष्टाचारियों की वजह से खत्म सी होती जा रही हैं। देश के कई राज्यों में भूख से मरने वाले लोगों में वृद्धि लगातार हो रही है। औद्योगिक घरानों को गरीबों की जमीन छीन कर उनका व्यवसायीकरण करने की खुली छूट दे रही है। नक्सली हमलों में सैकड़ों जवानों की मौत, लेकिन ठोस कार्रवाई नहीं। आतंकियों पर नरम रवैया सरकार का प्रमुख एजेंडा,जिसको विपक्ष भरे संसद में कह चुका है। दफ्तर में बाबुओं को फाइलें दबाते को बहुत सुना था अब तो आतंकियों की भी फाइलें दबा कर बैठ जाती है सरकार। विदेश नीति में लचर रवैया,पाकिस्तान के साथ वार्ता...फिर भी सीमापार से घुसपैठ में 60फीसदी का इजाफा। परमाणु समझौते को चुपके से कर तो लिया..फल हमारी कौन सी पीढ़ी भोगेगी कोई नहीं जानता। अमेरिकी राजनीतिक दबाव में घुटनों के बल चलते रहना। खेलों में राजनेताओं की सरकारी दादागीरी। अपने हितों के लिए खेलों को धंधा बनाने का चलन। बड़े गेम्स कराने के लिए बड़ा पैसा, उगाई जनता के पेट से,बाजार में महंगाई के नाम पर नए कर लगाकर अ-वैध रूप से धन की उगाही करना। साल के बजट में 2 रोटी, आधा कटोरी चावल, 100 रुपए किलो वाली 1 कटोरी दाल भी ठीक तरह से लोगों को मुहैया न करा पाना। घर, मकान की इतने महंगे, कि आम आदमी का सिर्फ मन को मसोस कर रह जाना। खापों को समर्थन से समाज में रुढ़ीवादी लोगों का वर्चस्व सामने लाना। मॉल संस्कृति को और उदारवादी बनाने के लिए भरपूर पैसा खर्च करना। त्रासदियों पर खुद को फंसता देख हजारों करोड़ों देकर जनता मुंह बंद करवा देना।
चुनाव आते सरकार के नुमाइंदे बरसाती मेढ़कों की तरह जनता में नेताओं का आना और भोली भाली जनता को मूर्ख बनाना। पार्टी के लिए चंदा देने वालों की नई लिस्ट बनाना और फिर उसी पैसे से गांव,गांव घूमकर गरीब को झूठे वादों से बरगलाना। फिर चुनाव जीते तो सीधे 5साल तक शक्ल नहीं दिखाना। जनता चाहे तो भी कुछ नहीं कर सकती..क्योंकि युवराज ने कह दिया राजनीति में दबंग और पैसे वाले ही आते हैं, गरीब, आदिवासियों का यहां कोई काम नहीं है। दल कोई भी हो सत्ता मे कोई भी दल हो, चाहे कोई भी नेता हो यही सोचता है गद्दी मिले तो सब बराबर कर देंगे। न देश में गरीब रहेंगे और न रहेगी गरीबी। हम ऐसी ही सरकारें चुनते हैं और हम ही बेबसी का रोना रोते हैं। दोषी हम हैं तो सरकार को कोसना कहां तक न्यायोचित है। सरकार तो अखबार में अपनी उपलब्धियों और उदघोषणाओं का विज्ञापन छपवाकर फुर्सत हो जाती है, लेकिन गरीबों के लिए वह अखबार रोटी रखने का कागज मात्र बन कर रह गया है।
दोषी कौन है आज नगर हो, महानगर हो, कस्बा या गांव सभी जगह लोग त्रस्त हैं। शहरों में लोग बेबसी की जिंदगी जी रहे हैं। गांव में पनप रही बेरोजगारी को सरकार बेरोजगारी नहीं समझती इसलिए गांव के लोगों का शहरों में पलायन नहीं रोक पा रही। मनरेगा जैसी कई बड़ी योजनाएं भ्रष्टाचारियों की वजह से खत्म सी होती जा रही हैं। देश के कई राज्यों में भूख से मरने वाले लोगों में वृद्धि लगातार हो रही है। औद्योगिक घरानों को गरीबों की जमीन छीन कर उनका व्यवसायीकरण करने की खुली छूट दे रही है। नक्सली हमलों में सैकड़ों जवानों की मौत, लेकिन ठोस कार्रवाई नहीं। आतंकियों पर नरम रवैया सरकार का प्रमुख एजेंडा,जिसको विपक्ष भरे संसद में कह चुका है। दफ्तर में बाबुओं को फाइलें दबाते को बहुत सुना था अब तो आतंकियों की भी फाइलें दबा कर बैठ जाती है सरकार। विदेश नीति में लचर रवैया,पाकिस्तान के साथ वार्ता...फिर भी सीमापार से घुसपैठ में 60फीसदी का इजाफा। परमाणु समझौते को चुपके से कर तो लिया..फल हमारी कौन सी पीढ़ी भोगेगी कोई नहीं जानता। अमेरिकी राजनीतिक दबाव में घुटनों के बल चलते रहना। खेलों में राजनेताओं की सरकारी दादागीरी। अपने हितों के लिए खेलों को धंधा बनाने का चलन। बड़े गेम्स कराने के लिए बड़ा पैसा, उगाई जनता के पेट से,बाजार में महंगाई के नाम पर नए कर लगाकर अ-वैध रूप से धन की उगाही करना। साल के बजट में 2 रोटी, आधा कटोरी चावल, 100 रुपए किलो वाली 1 कटोरी दाल भी ठीक तरह से लोगों को मुहैया न करा पाना। घर, मकान की इतने महंगे, कि आम आदमी का सिर्फ मन को मसोस कर रह जाना। खापों को समर्थन से समाज में रुढ़ीवादी लोगों का वर्चस्व सामने लाना। मॉल संस्कृति को और उदारवादी बनाने के लिए भरपूर पैसा खर्च करना। त्रासदियों पर खुद को फंसता देख हजारों करोड़ों देकर जनता मुंह बंद करवा देना।
चुनाव आते सरकार के नुमाइंदे बरसाती मेढ़कों की तरह जनता में नेताओं का आना और भोली भाली जनता को मूर्ख बनाना। पार्टी के लिए चंदा देने वालों की नई लिस्ट बनाना और फिर उसी पैसे से गांव,गांव घूमकर गरीब को झूठे वादों से बरगलाना। फिर चुनाव जीते तो सीधे 5साल तक शक्ल नहीं दिखाना। जनता चाहे तो भी कुछ नहीं कर सकती..क्योंकि युवराज ने कह दिया राजनीति में दबंग और पैसे वाले ही आते हैं, गरीब, आदिवासियों का यहां कोई काम नहीं है। दल कोई भी हो सत्ता मे कोई भी दल हो, चाहे कोई भी नेता हो यही सोचता है गद्दी मिले तो सब बराबर कर देंगे। न देश में गरीब रहेंगे और न रहेगी गरीबी। हम ऐसी ही सरकारें चुनते हैं और हम ही बेबसी का रोना रोते हैं। दोषी हम हैं तो सरकार को कोसना कहां तक न्यायोचित है। सरकार तो अखबार में अपनी उपलब्धियों और उदघोषणाओं का विज्ञापन छपवाकर फुर्सत हो जाती है, लेकिन गरीबों के लिए वह अखबार रोटी रखने का कागज मात्र बन कर रह गया है।
Thursday, May 6, 2010
अंत भला तो सब भला
9:02 AM
अंत भला तो सब भला, कहावत है लेकिन किसी का अंत भी बुरा हो और शुरूआत भी बुरी तो भला कहां सो होय। मुझे याद है 26 नवंबर का वो दिन जब मैं अपने घर झांसी से लौटा था। दफ्तर में मेरी नाइट शिफ्ट लगा दी गई। रात 10 बजकर 15 मिनट पर दफ्तर पहुंचा, चैनल की सीढ़ियां चढ़ ही रहा था, किसी मीडियापर्सन ने मुझे खबर दी, एक खबर आई है, मुंबई में गैंगवार चल रही है। मैं अपनी डेस्क पर पहुंचा तो देखा मुंबई में फायरिंग हो रही है और अलग चैनल्स पर अलग-अलग खबरें आ रही हैं। कोई कह रहा था गैंगवार तो कोई कह रहा था आतंकी हमला। लगभग 1 घंटे बाद सरकार ने आतंकी हमले की पुष्टि कर दी। ये हमला अप्रत्याशित था, किसी भी शख्स को ये यकीन नहीं हो पा रहा था कि ये आतंकी हमला है। और धीरे धीरे ये भारत पर सबसे बड़ा हमला बन गया, पाकिस्तान के कराची से समुद्र के रास्ते आए 10 आतंकियों ने मुंबई शहर में कत्लेआम मचाया, ताज, ट्राइडेंट होटलों पर कब्जा कर बेगुनाह लोगों को मारा, लगभग 59 घंटों मुंबई शहर आतंकियों के खौफ के साए में जीता रहा। एनएसजी ने अपना काम बखूबी किया, हमले में 166 लोग मारे गए, जिसमें 25 विदेशी थे। मैंने इससे पहले शायद ही इतना बड़ा ऑपरेशन शायद ही पहले कभी देखा था। इस कार्रवाई में एक आतंकी अजमल आमिर कसाब को हमारे सुरक्षाबलों ने गिरफ्तार किया। मैं दफ्तर में लगातार 2 दिन ऑपरेशन की खबरों के बीच गुजारे, उन्हें खबरों और उनकी विश्वसनीयता को करीब से जाना, आतंकी हमले से जुड़ी एक एक खबर जनता तक पहुंचाई। एक जंग जैसा था सब कुछ। आज मुझे फिर वही दिन याद आया है खुशी है कि कोर्ट ने कसाब को उसके कर्मों की सजा के फांसी के रूप में सुनाई है। आज फिर वही चैनल है, फिर वही कुर्सी है, बस बदल गया है वक्त.Thursday, April 1, 2010
सारे देश की बेटी बन गईं सानिया…!!
2:45 PM
सानिया मिर्जा शादी कर रहीं हैं, अच्छी बात है कि उन्होंने अपना घर बसाने का निर्णय ले लिया है। कुछ दिन पहले भी उन्होनें ऐसा ही एक फैसला लिया था, लेकिन दिल तो बच्चा है कभी कभी नादानियां कर बैठता है। लेकिन इस बार तो कुछ और ही हो रहा है। सानिया पाकिस्तान जा रही हैं... अरे भई टेनिस खेलने नहीं...ब्याह कर जा रही हैं पड़ोसी देश में। उनके इस फैसले ने पहले तो कई दिलों को तोड़ा फिर उन्हें मरोड़ा, और इतना मजबूर कर दिया की हर हिंदुस्तानी कि जुंबा से निकल रहा है, सानिया मत जाओ पाकिस्तान। लेकिन क्या करें दिल तो हिंदुस्तानी है न.. हिलोरे मार रहा है.. अरे भई प्यार किया है कोई चोरी नहीं की.. सीना तान के बोलो.. लेकिन भईया हिंदुस्तान में प्यार करने वालों को अपनी प्यार की कीमत हर हाल में चुकानी होती है। सो ये मौका भी आ ही गया... दस्तूर तो अभी दूर है। पाकिस्तान क्रिकेट टीम के कैप्टन रह चुके शोएब मलिक से भारत की टेनिस स्टार सानिया की सगाई की खबर आते ही लोगों का गुस्सा फूट पड़ा और जहां-तहां लोगों ने इस रिश्ते का खूब विरोध किया। मुंबई में कुछ लोगों ने विरोध प्रदर्शन के दौरान लोगों ने सानिया के पोस्टरों वाले बैनर को आग लगा दी। ये गुस्सा क्यों है.. ये बेइंतहा नफरत क्यों है। क्या पाकिस्तानी लोगों के पास दिल नहीं, क्या वे मोहब्बत करना नहीं जानते। क्या दो देशों की सरहदों पर तैनात जवान ही जंग से इस दूरी को मिटा पाएंगे। क्यों सानिया पाकिस्तान में नहीं जा सकती?..... अचानक सारे देश की बेटी बन गई सानिया और भारत में बेटी परिवार के फैसले के बिना डग भर नहीं चलतीं।
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