Wednesday, June 30, 2010

ग्लैमर का आखिरी सच...!

5:51 AM

फैशन की दुनिया काला सच एक बार फिर सामने आया, 1994 में कामसूत्र के विज्ञापन से पूरे देश मे तहलका मचा देने वाली पूर्व सुपर मॉडल विवेका बाबाजी ने अपने घर में फांसी लगाकर खुदकुशी कर ली। उनकी लाश मुंबई में बांद्रा स्थित उनके फ्लैट में पंखे से लटकती पाई गई। उनकी मौत फैशन इंडस्ट्री में किसी सनसनी से कम नहीं थी। ऐसा कहा जा रहा है गौतम से विवेका का ब्रेक अप हुआ था जिसके बाद विवेका डिप्रेशन में रहने लगी थीं।विवेका का पार्टनर कार्तिक का नाम भी इस मर्डर मिस्ट्री से जुड़ रहा है। मिस मॉरिशस रह चुकीं विवेका 90के दशक के शुरुआती वर्षों में मुंबई आईं और मॉडलिंग की दुनिया में छा गईं। उनका मॉ़डलिंग करियर बहुत ही शानदार रहा। हरभजन मान के बिल्लो गाने से लोगों ने उन्हें पर्दे पर पहचाना।फिल्म 'ये कैसी मुहबबत है' में उन्हें लीड रोल मिला। विवेका ने दक्षिण की कई फिल्मों में भी हाथ आजमाया। लेकिन फुल टाइम एक्ट्रेस नहीं बन सकीं।
                                               
एक समय ऐसा आया जब विवेका ने फैशन इंडस्ट्री को गुड बाय कह दिया था।पिछले साल वह वापस लौटी और अपनी एक इवेंट मैनेजमेंट कंपनी का काम शुरू किया था।
विवेका कई अनसुलझे सवाल छोड़ गईं है ऐसा क्या हुआ होगा जब उन्होंने अचानक ऐसा कदम उठाया। क्या उनको किसी ने उकसाया था, क्या उनका भी फैशन की दुनिया से मोह भंग हो गया था। क्या है विवेका की मौत का रहस्य कई सवालों के जबाव अभी आने बाकी है।लेकिन ग्लैमर और फैशन के पीछे का क्या सच यही है...कई फैशन इंडस्ट्री में कई ऐसी घटनाएं सामने आ चुकी हैं।
 दुनिया भर में रैम्प पर मद मस्त कर देने वाले संगीत पर जलवे बिखेरती मॉडल्स सभी आकर्षित करती हैं। कंपटीशन के इस दौर में अपनी एक अलग छवि बनाने के लिए मॉडल्स कुछ भी कर गुजरते हैं।लेकिन इस चकाचौंध  में कई चीजें छिप जाती और  दुर्घटनाओं के रूप में सामनेआती हैं। इस श्रेणी में अकेली विवेका ही नहीं हैं। जुलाई 2004में एमटीवी की सबसे चर्चित वीजे और मॉडल नफीसा जोजफ ने भी मुंबई के अपने फ्लैट में फांसी लगाकर आत्‍महत्‍या कर ली थी। नफीसा अपने व्‍यवसायी मित्र गौतम खंडुजा से शादी करने वाली थीं, लेकिन ये रिश्‍ता टूट गया। नफीसा सह नहीं सकी और आखिरकार डिप्रेशन में आकर खुदकुशी कर ली।

इसके  एक साल बाद ही टीवी सीरियल कैट्स से पहचान बनाने वाली मॉडल कुलजीत रंधावा ने भी आत्‍महत्‍या कर ली। ये सिलसिला यहीं नहीं रुका चित्रा सिंह की बेटी मोनिका चौधरी ने मई 2009 में अपने मुंबई के आवास में आत्‍महत्‍या कर ली थी। मोनिका अपने जमाने की मशहूर मॉडल थी। मोनिका की आत्‍महत्‍या के पीछे असफल रिश्‍तों को मुख्‍य वजह माना गया।मॉडलिंग में हर तरह से परफेक्ट लगने की चाहत भी कभी कभी ऐसी घटनाओं को अंजाम देती हैं।कई ऐसी मॉडल्स हैं जिनकी मौत का सच आज तक कोई नहीं जान सका। लेकिन शायद ग्लैमर का आखिरी अंजाम यही है ।विवेका का सच लोगों के सामने आ पाएगा ये वक्त से ही बता पाएगा लेकिन फैशन की ये दुनिया जितनी रंगीन दिखाई देती है उतनी ही रंगहीन भी है।

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Monday, June 28, 2010

“घुटघुट कर जी रही जनता, घूंटघूंट पी रही सरकार” !

3:30 PM



ये तस्वीरें याद दिलाती है यूपीए सरकार में हुए घटनाक्रमों की... पिछले 6वर्षों से सत्ता का सुख भोग रही सरकार ने एक साल में चार बार तेल के दामों में वृद्धि करके आम आदमी की कमर तोड़ दीहै। हालिया बयान में वित्त मंत्री ने कहा है कि महंगाई अभी और बढ़ेगी। इन फैसलों से सरकार की तानाशाही नियति साफ नजर आ रही। पिछले कई सालों से लगातार महंगाई से जूझती जनता को इससे मुक्ति कब मिलेगी ये कहना नामुमकिन सा हो गया है। खाद्य पदार्थों से लेकर रोजमर्रा की वस्तुओं के लगातार दाम बढ़ने से आम आदमी नरकीय जीवन जीने को मजबूर है। उसे कहीं से भी उम्मीद की एक किरण नजर नहीं आ रही। गरीबी,महंगाई बेरोजगारी ने आज पूरे देश को जकड़ रखा है फिर भी सरकार नहीं चेत रही मनमानी किए जा रही है।
दोषी कौन है आज नगर हो, महानगर हो, कस्बा या गांव सभी जगह लोग त्रस्त हैं। शहरों में लोग बेबसी की जिंदगी जी रहे हैं। गांव में पनप रही बेरोजगारी को सरकार बेरोजगारी नहीं समझती इसलिए गांव के लोगों का शहरों में पलायन नहीं रोक पा रही। मनरेगा जैसी कई बड़ी योजनाएं भ्रष्टाचारियों की वजह से खत्म सी होती जा रही हैं। देश के कई राज्यों में भूख से मरने वाले लोगों में वृद्धि लगातार हो रही है। औद्योगिक घरानों को गरीबों की जमीन छीन कर उनका व्यवसायीकरण करने की खुली छूट दे रही है। नक्सली हमलों में सैकड़ों जवानों की मौत, लेकिन ठोस कार्रवाई नहीं। आतंकियों पर नरम रवैया सरकार का प्रमुख एजेंडा,जिसको विपक्ष भरे संसद में कह चुका है। दफ्तर में बाबुओं को फाइलें दबाते को बहुत सुना था अब तो आतंकियों की भी फाइलें दबा कर बैठ जाती है सरकार। विदेश नीति में लचर रवैया,पाकिस्तान के साथ वार्ता...फिर भी सीमापार से घुसपैठ में 60फीसदी का इजाफा। परमाणु समझौते को चुपके से कर तो लिया..फल हमारी कौन सी पीढ़ी भोगेगी कोई नहीं जानता। अमेरिकी राजनीतिक दबाव में घुटनों के बल चलते रहना। खेलों में राजनेताओं की सरकारी दादागीरी। अपने हितों के लिए खेलों को धंधा बनाने का चलन। बड़े गेम्स कराने के लिए बड़ा पैसा, उगाई जनता के पेट से,बाजार में महंगाई के नाम पर नए कर लगाकर अ-वैध रूप से धन की उगाही करना। साल के बजट में 2 रोटी, आधा कटोरी चावल, 100 रुपए किलो वाली 1 कटोरी दाल भी ठीक तरह से लोगों को मुहैया न करा पाना। घर, मकान की इतने महंगे, कि आम आदमी का सिर्फ मन को मसोस कर रह जाना। खापों को समर्थन से समाज में रुढ़ीवादी लोगों का वर्चस्व सामने लाना। मॉल संस्कृति को और उदारवादी बनाने के लिए भरपूर पैसा खर्च करना। त्रासदियों पर खुद को फंसता देख हजारों करोड़ों देकर जनता मुंह बंद करवा देना।
 चुनाव आते सरकार के नुमाइंदे बरसाती मेढ़कों की तरह जनता में नेताओं का आना और भोली भाली जनता को मूर्ख बनाना। पार्टी के लिए चंदा देने वालों की नई लिस्ट बनाना और फिर उसी पैसे से गांव,गांव घूमकर गरीब को झूठे वादों से बरगलाना। फिर चुनाव जीते तो सीधे 5साल तक शक्ल नहीं दिखाना। जनता चाहे तो भी कुछ नहीं कर सकती..क्योंकि युवराज ने कह दिया राजनीति में दबंग और पैसे वाले ही आते हैं, गरीब, आदिवासियों का यहां कोई काम नहीं है। दल कोई भी हो सत्ता मे कोई भी दल हो, चाहे कोई भी नेता हो यही सोचता है गद्दी मिले तो सब बराबर कर देंगे। न देश में गरीब रहेंगे और न रहेगी गरीबी। हम ऐसी ही सरकारें चुनते हैं और हम ही बेबसी का रोना रोते हैं। दोषी हम हैं तो सरकार को कोसना कहां तक न्यायोचित है। सरकार तो अखबार में अपनी उपलब्धियों और उदघोषणाओं का विज्ञापन छपवाकर फुर्सत हो जाती है, लेकिन गरीबों के लिए वह अखबार रोटी रखने का कागज मात्र बन कर रह गया है।

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Thursday, June 24, 2010

नेताओं की नौटंकी, जनता का मनोरंजन

6:31 PM

बिहार में जल्द ही विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। ऐसे में कोई यात्राएं निकाल रहा है तो कोई भड़ास निकाल रहा है। सभी दल अपनी अपनी तैयारियों में जुटे हैं। सभी पार्टियां अपनी रणनीतियां बना रहीं है। जिसमें लोगों का मनोरंजन भी शामिल है, जो चुनाव प्रचार के दौरान लोगों का मनोरंजन करती है। नौटंकी का कई मौकों पर विशेष महत्व होता है। ये नौटंकियां चुनाव में खड़े नेताओं द्वारा प्रायोजक होती है, हालांकि नौटंकियों में नाचने वाले लोगों को पर जो पैसा है फेंका जाता है वो आम जनता और व्यापारियों की तिजोरी से ही निकला होता है। नौटंकियों से राजनेताओं को लोगों का रूझान पता चल जाता है कि ऊंट किस करवट बैठेगा। वक्त बदल रहा है अब चुनाव में नौटंकियों का जिम्मा खुद राजनेताओं ने ले लिया है। हाल ही में बीजेपी-जेडीयू की आपसी रस्साकशी को आरजेडी सुप्रीमो लालू यादव ने नौटंकी करार दिया। नौटंकी की शुरूआत बिहार के अखबारों में बीजेपी के चर्चित नेता नरेंद्र मोदी के साथ बिहार के मुख्यमंत्री के साथ तस्वीर छापने से शुरू हुआ। नीतीश कुमार ने तस्वीर छापने पर आपत्ति जताई और रात्रि भोज भी कैंसिल कर दिया। इसका असर तुरंत बीजेपी की रैली में देखने को मिला। जब नरेंद्र मोदी ने बिहार में विकास की तारीफ तो की लेकिन नीतीश का नाम तक नहीं लिया। नीतीश से कुछ पत्रकार भाईयों ने पूछ लिया गुजरात ने बिहार को कोसी के लिए सहायता दी थी। बस नीतीश ने आव देखा न ताव कर दिया ऐलान, वापस कर देंगे रुपए वो तो खर्च ही नहीं हुए। नीतीश ने गुजरात को 5 करोड़ का चेक लौटा दिया। नौटंकी यहीं खत्म नहीं हुई। नीतीश ने ऐलान कर दिया नरेंद्र मोदी और वरुण गांधी बिहार में चुनाव प्रचार करने नहीं आएंगे। बिहार के उप मुख्यमंत्री के साथ चुनावी यात्रा में नहीं गए। दोनों पार्टियों के नेता टीवी पर एक-दूसरे पर आरोप लगाते पाए गए। बड़े नेता इससे थोड़ा बचते रहे। लेकिन जब बड़े नेताओं ने खुलकर नीतीश का विरोध किया तो दोनों में ठन गई। इस निर्थक युद्ध को सभी प्रमुख गैर एनडीए पार्टियों ने ‘नाटक’ करार दिया जो कि दोनों ही पार्टियां कर रही हैं। लेकिन देश की प्रमुख पार्टियों में शामिल बीजेपी क्या सत्ता लोभ में अपने नेताओं को बेइज्जत भी करा सकती है ये इस नौटंकी में पहली बार देखने को मिला। नीतीश कुमार को गठबंधन की राजनीति अब शायद बीजेपी के साथ नहीं सुहा रही, वे बिहार में कुछ नया खोज रहे हैं। बिहार में बीजेपी का भविष्य क्या है ये उनको खुद तय करना होगा। कोसी आपदा के लिए अरबों रुपए धन लिया, खर्च एक पाई नहीं किया। ऐसे में जनता को मूर्ख समझने वाले नीतीश कुमार को आगामी चुनाव में जनता क्या सबक सिखाएगी इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है।

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Monday, June 21, 2010

'फादर्स डे' की सौवीं सालगिरह

8:14 AM


2010 में फादर्स डे अपनी 100वीं सालगिरह मना रहा है। इसके जन्मस्थान स्पोकन में महीने भर उत्सव मनाया जा रहा है। फादर्स डे पर कोई भी बेटा अपने पिता को उपहार देकर इस दिन को यादगार बनाना चाहेगा। पिता को सम्मान देने के लिए बनाया गए फादर्स डे का इतिहास भी कम रोचक नहीं है। अमेरिका के वॉशिंगटन में रहने वाली सोनोरा स्मार्ट डोड ने 1909 में स्पोकेन के सेंट्रल मेथोडिस्ट एपिस्कोपल चर्च में मदर्स डे के बारे में सुना तो उन्हे पिता के लिए भी ऐसा ही दिनो होने की जरूरत महसूस होने लगी। सोनोरा के पिता विलियम स्मार्ड ने अपनी पत्नी के गुजरने के बाद पूरे परिवार की देखभाल की थी। सोनोरा इसके लिए उनको दिल से धन्यवाद देना चाहती थी। लिहाजा पहली बार 1910 में जून के तीसरे रविवार को पहली बार फादर्स डे मनाया गया। फादर्स डे को अधिकारिक छुट्टी का दिन बनाने के लिए लंबा इंतजार करना पड़ा। चर्च और लोगों का समर्थन मिलने का बावजूद कैलेंडर से इस दिन के गायब हो जाने का खतरा पैदा होने लगा था। एक ओर जहां मदर्स डे पूरे उत्साह के साथ मनाया जाता था। वहीं फादर्स डे केवल चुटकुलों में जगह पा रहा था। एक स्थानीय अखबार स्पोक्समैन में फादर्स डे पर चुटकुले प्रकाशित हुए.। 1913 में अमेरिकी कांग्रेस में इसे राष्ट्रीय स्तर पर त्यौहार के रूप में मनाने के लिए पहली बार बिल पेश किया गया। राष्ट्रपति विलसन इसे आधिकारिक दर्जा देना चाहते थे। लेकिन कांग्रेस ने इसका विरोध किया। उन्हे इस बात से डर सथा कि कहीं इस डे का व्यवसायीकरण न हो जाए।अमेरिका में कई बार इस बिल को पेश किया गया लेकिन हर बार नामंजूर हो गया। 1957 में सीनेटर मार्गेट स्मिथ ने कांग्रेस को एक खत लिखा और कहा 40 सालों से मां को सम्मानित किया जा रहा है। पिता को क्यूं नजर अंदाज किया जा रहा है। 1966 में राष्ट्रपति लिंडन जोनसन ने पहली बार जून के तीसरे रविवार को फादर्स डे मनाने की पहली सरकारी घोषणा की। 6 साल बाद आखिरकार फादर्स डे अमेरिका में छुट्टी का दिन बन गया। राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने इस संबंध में एक कानून पर हस्ताक्षर किए इस तरह फादर्स डे को यहां पहुंचने पर बड़ा संघर्ष करना पड़ा। लेकिन अब ये दिन दुनियाभर में मनाया जाता है।

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Friday, June 18, 2010

सतयुग के रावण की कलयुगी कहानी !

6:53 PM

आज के समय में रावण अगर पैदा होता तो वो कैसा होता, शायद रावण फिल्म के जैसा तो नहीं होता। वैसे रावण फिल्म थोड़ी लीक से हटकर कहानी है, फिल्म में गजब की लोकेशन और घने जंगलों के बीच दिल दहलाते ऐक्शन सीन हैं। फिल्म की कई ऐसी खासियतें है जो आम बॉलिवुड फिल्मों में नजर नहीं आतीं। साउथ के डायरेक्टर मणिरत्नम की फिल्में रोजा , बॉम्बे , युवा , गुरु जैसी उनकी फिल्में आज भी सिने प्रेमियों के जहन में ताजा है। करीब दो साल पहले जब इस फिल्म को बनाने की कवायद शुरू हुई तभी से मीडिया में फिल्म को रामायण से प्रभावित बताने की मुहिम चल निकली। अब जब फिल्म दर्शकों के सामने है तो इससे प्रभावित दर्शक थिएटर पहुंचकर फिल्म देखकर खुद को ठगा ठगा महसूस करता है। ये कहानी एक गांव में अपने दो भाइयों और इकलौती बहन के साथ गुस्सैल बीरा ( अभिषेक बच्चन ) जिंदगी गुजार रहा है। कबीले में बीरा का पूरा दबदबा है हर कोई उसकी एक आवाज पर जान देने को तैयार रहता है। दरअसल , बीरा कबीले की खातिर किसी से भी टकराने को तैयार रहता है। बीरा के लिए सब कुछ उसकी बहन है। बीरा को जब पता लगता है कि बहन किसी से प्यार करती है तो झट उसकी शादी कराने के लिए राजी हो जाता है। शादी के मंडप में एसपी देव ( विक्रम ) अपने दलबदल के साथ अटैक करता है और पुलिस की गोलाबारी के बीच दूल्हा मंडप छोड़कर भाग जाता है और पुलिस बीरा की बहन को थाने ले जाती है। थाने में सामूहिक बलात्कार के बाद बीरा की बहन आत्महत्या कर लेती है। दूसरी और बीरा अपने साथियों के साथ जंगल में डेरा डाले एसपी की खूबसूरत पत्नी रागिनी ( ऐश्वर्या राय ) को उठाकर ले जाता है। कबीले के सभी लोग रागिनी को जान से मारने के लिए कहते हैं , लेकिन बीरा 14 दिन बाद रागिनी को मारने का फैसला करते है। इन्हीं 14 दिनों की कहानी है रावण। जहां रागिनी का पति देव उसे बीरा की कैद से छुटकारा दिलाने के लिए पूरी टीम के साथ जंगल की खाक छान रहा है। दूसरी ओर बीरा का अतीत जानकर रागिनी उससे हमदर्दी करने लगती है। इस फिल्म में मणिरत्नम पिछली फिल्मों जैसा जादू नहीं चला पाए। इंटरवल से पहले का समय उन्हें पात्रों का परिचय देने में लग गया। वहीं कहानी के अहम पात्रों को रामायण के साथ जोड़ना भी गलत रहा। हां , अपनी इमेज की तर्ज पर मणि की इस फिल्म में बैकग्राउंड म्यूजिक और गजब लोकेशन में मणि छा गए। फिल्म के कुछ गाने पहले से म्यूजिक चार्ट के टॉप टेन में शामिल है। लेकिन ए . आर रहमान और गुलजार की जोड़ी ने अपनी पिछली फिल्मों में जो संगीत का जादू चलाया वह यहां नदारद है। हां , मणि ने गानों को बड़ी मेहनत और ऐसी रमणीक लोकेशन पर शूट किया है कि दर्शक गानों से बंधे रहते हैं। फिल्म रावण का सबको बेसब्री से इंतजार था, लंदन में शानदार प्रीमियर में जुटे लोगों का तो यही कहना था कि इससे बेहतर कुछ नहीं। फिल्म समीक्षकों के गले से फिल्म नहीं उतरी। दर्शक इसे कितने पंसद करते हैं ये देखने वाली बात होगी।

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