Thursday, December 2, 2010
क्या सत्ता के दलाल बनते जा रहे हैं पत्रकार?
2:23 PM
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| बुरे फंसे प्रभु, वीर और बरखा |
लोकतंत्र का चौथे स्तंभ पत्रकारिता में गुंडे तो पहले से थे ही अब दलाल भी घुस गए हैं। अधिकतर मीडिया समूह अब दलाली का अखाड़ा बन गए हैं। ऐसा कुछ दिनों पहले कॉरपोरेट घरानों के लिए काम करने वाली नीरा राडिया के साथ अख़बारों और टेलिवीज़न के नामचीन पत्रकारों की बातचीत के टेप प्रकाशित किए गए थे जिनमें ये पत्रकार डीएमके के नेता ए. राजा को मंत्रिमंडल में शामिल करवाने की पैरवी करते नज़र आए या फिर अंबानी बंधुओं के झगड़े में पक्ष लेते नज़र आए। ये सभी मीडिया के मठाधीश माने जाते हैं जिनकी बातों पर लोग आंखें मूंदकर विश्वास कर लते हैं, इन टेपों से मीडिया जगत में सनसनी मची हुई है, जिनके नाम इन टेप में आए है जिनमे प्रमुख रूप से प्रभु चावला आजतक से, वीर सांघवी, एचटी मीडिया और एनडीटीवी की पत्रकार बरखा दत्त शामिल हैं।
कॉरपोरेट घरानों की दलाली के आरोपों के चलते पूरे मीडिया जगत को शक की नजर से देखा जाने लगा है। नीरा राडिया ने ए.राजा को मंत्री बनने के लिए लॉबिंग कराए जाने के पीछे क्या मकसद था हजारों करोड़ के घोटाले के बाद ये पता चल ही गया। कॉरपोरेट घरानों में नाम आने से टाटा और अंबानी की भी फजीहत हुई है, राडिया के साथ टेप का खुलासा होने के बाद आखिर रतन टाटा इतना बौखलाए क्यों घूम रहे हैं, टेप में ऐसा क्या है जिसने रतन टाटा की नब्ज पकड़ ली है। फिलहाल 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है जहां सुप्रीम कोर्ट ने प्रधानमंत्री और ए.राजा समेत सरकार को बचाने वाली सीबीआई को कटघरे में खड़ा कर दिया। अपनी तीखी टिप्पणियों में कोर्ट ने कहा- सरकार भ्रष्टाचार पर काबू करने में नाकाम है। सरकार की भ्रष्टाचारी पॉलिसी किस हद तक कारगर साबित हो रही है इसका अंदाजा इसी बात से हो गया जब उसने भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे पीजे थॉमस को पहले तो सीवीसी बनाया, लेकिन जब बात 2जी स्पेक्ट्रम मामले की जांच की आई तो विरोध के बाद थॉमस को घोटाले की जांच से बाहर कर दिया। वाह री सरकार...अब सीवीसी जैसे पदों पर बैठे लोग भी खाएंगे और खिलाएंगे।
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| रतन टाटा क्यो छिपा रहे हैं राडिया के राज |
| राजा तूने क्या किया, मुझे ही ले डूबा |
भ्रष्टाचार का सरकारी नंगापन इस हद तक बढ़ गया है कि सरकार बचाने के लिए सत्ता मोही कांग्रेस पार्टी देश को बेचने के लिए तैयार बैठी है। फिर चाहे वह आदर्श सोसायटी घोटाला हो, कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाला हो या फिर 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला, सरकार भरी बैठी है हर किसी को एक मौके जरूर दे रही है। लेकिन मीडिया में मचा हडकंप इस बार जल्द शांत होते नहीं दिखता। पत्रकारों की मांग है कि भ्रष्टाचारी राजा का साथ देने वाले वरिष्ठ पत्रकारों की पूरी सच्चाई देश के सामने जरूर आनी चाहिए ताकि इस प्रोफेशन से गुंडे और दलालों की विदाई हो सके। इस विवाद के बाद सबसे बड़ा सवाल ये उठने लगा है कि क्या पत्रकार सत्ता को आइना दिखाने और उसे सच की कसौटी पर कसने की बजाए सत्ताधीशों के लिए बिचौलिए का काम करने लगे हैं? जो पत्रकार समाज तक सच पहुँचाने का दावा करते हैं वो अगर उद्योगपतियों और नेताओं के लिए संदेशवाहक का काम करने लगेंगे तो क्या जनता आज़ाद प्रेस पर भरोसा बरकरार रख पाएगी?
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