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Monday, December 13, 2010

देश का अपमान, फिर भी हमारे नेताजी महान !

10:37 PM

 आज कल कांग्रेस पार्टी के नेताओं की मनोदशा दिन पर दिन बिगड़ती ही जा रही है। कांग्रेस के बड़े बड़े महारथी लगातार धर्म,आतंकवाद पर गैर जरूरी बयान देकर देश के लोगों को गुमराह करने में लगे हुए हैं। जिससे अराजकता का महौल पैदा हो रहा है। अपराध हो या आतंकवाद दोनों पर लगाम लगाने की बजाय जनता को मूर्ख बनाकर भ्रष्टाचार के गंभीर मुद्दों से भटकाया जा रहा है। मंत्री हो या महासचिव सभी ने ठान ली है कि काम नहीं करेंगे सिर्फ बयान देंगे। जिससे भ्रष्टाचार में फंसी कांग्रेस सरकार को कुछ तो राहत दे सकें। अपराधियों और आतंकियों को प्रोमोशन दे रही सरकार के बेलगाम होते मंत्री अपने बयानों में अब देश को तोडने वाली भाषा इस्तेमाल भी कर रहे हैं।कांग्रेसी नेताओं ने आतंकवाद और अपराधीकरण पर औने-पौने बयान देकर इनकी परिभाषाएं ही बदल दी हैं। ऐसे ही कुछ किया है वरिष्ठ कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह और गृहमंत्री चिदंबरम ने जो कि देश विरोधी बयान देने के मामले में बुरी तरह फंस गए हैं।


दिग्गी राजा इस बार बुरे फंसे हैं, कहीं पार्टी से हाथ ना धो बैठें

दिग्विजय सिंह ने मुंबई हमले में मारे गए शहीद हेमंत करकरे पर दिए बयान में कहा-“हेमंत करकरे को हिंदू आतंकवादियों से बड़ा खतरा था। मुंबई हमले के कुछ घंटे पहले मेरी उनसे बात हुई थी, लेकिन रिपोर्ट में कहा गया की पाकिस्तानी आतंकियों की गोली मारी”।दिग्विजय सिंह जैसे नेता जिनके विवादास्पद बयानों से कांग्रेस को कई बार शर्मिंदा होना पड़ा है इस बार भी कांग्रेस ने उनका निजी बयान बताकर पल्ला झाड़ लिया लेकिन दिग्गी राजा तो अड़े हुए हैं। सबूत देने की बात कर रहे हैं। लेकिन सवाल ये उठता है उन्होंने कैसे इस बात को 2 साल तक पचाए रखा।

शहीद एटीएस चीफ हेमंत करकरे की पत्नी
दिग्विजय ने मुंबई हमले की याद फिर ताजा करके शहीद करकरे की विधवा पर सैंकड़ों तीरों की तरह वार किए हैं,बजाय माफी मांगने के दिग्विजय सिंह ने बीजेपी पर ही आरोप जड़ दिए। बात सही है कांग्रेस का पुराना चलन है,चोरी तो चोरी ऊपर से सीना जोरी...। क्या ये आतंकवाद का धर्मों में बंटवारा करके देश को बांटने की ओर इशारा है या फिर सुर्खियों बने रहने के लिए एक मनगढ़ंत कहानी है। करकरे पर बयान देना दिग्गी राजा के लिए कितना खतरनाक साबित होता है ये तो आनेवाला वक्त ही बताएगा लेकिन दिग्विजय साहब को देश की जनता को ये बताना होगा कि हिंदु आतंकवाद क्या होता है, मुस्लिम, सिख और ईसाई आतंकवाद क्या होता है।

खैर की क्या कहें हमारे गृह मंत्री का भी हाल यही है...चिदंबरम को मुंबई में हमले के बाद गृह मंत्री की गद्दी दी गई थी। जनता को शिवराज पाटिल जैसे वीआईपी गृह मंत्री की नाकामी के बाद चिदंबरम से काफी कुछ उम्मीदें थीं। लेकिन चिदंबरम भी देश को जोड़ने के बजाय तोड़ने वाले बयान दे रहे है।

शर्मसार होती देश की राजधानी
दिल्ली में बढ़ते अपराध को रोकने में नाकाम चिदंबरम साहब ने जनता पर ही धावा बोल दिया। जिसकी सुरक्षा व्यवस्था की जिम्मेदारी स्वयं उनके मंत्रालय की है। अपने बयान में कहा..“दिल्ली में बाहर आए लोग अनाधिकृत कॉलोनियों में बस गए है वही दिल्ली में अपराध कर रहे हैं”। इस बयान के बाद पूरे देश चिदंबरम की ऐसी भद्द पिटी जिसके बाद उन्हे 3 घंटों के भीतर उनकी ओर बयान वापस लेने की खबर आ गई।
बोलती बंद.. गृह मंत्री कह रहे हैं अब कभी कुछ नहीं बोलूंगा

विपक्ष और सत्ता पक्ष के भारी विरोध के चलते चिदंबरम ने अपने दूसरे बयान में कहा- मैं भी बाहर से आया हूं, मेरे बयान को तोड़ मरोड़ कर पेश किया गया। वाह चिदंबरम साहब दिल्ली में पूरे भारत से लोग आते हैं और देश की राजधानी पर पूरे देश का हक है। राजधानी की सुरक्षा क्या केवल विदेशियों के लिए है जो कि सिर्फ कॉमनवेल्थ में ही दिखाई पड़ी थी। क्या राजधानी के लिए सुरक्षा के नियम इतने सख्त नहीं होने चाहिए कि परिंदा भी पर ना मार सके। लेकिन आप तो उलटे जनता पर ही चढ़ गए।राजधानी में सुरक्षा तंत्र बूढ़ा हो चुका और टूटी खाट पर लेटकर पानी मांग रहा है। लगातार हो रहे गैंगरेप,मर्डर चोरियों से दिल्ली पुलिस के काम करने के तरीके पर सवालिया निशान लगा दिया है ऐसे में कोई आतंकी हमला हो जाता है तो कोई बड़ी बात नहीं होगी। इससे पहले भी दिल्ली की मुख्यमंत्री और शीला दीक्षित और राज्यपाल तेंजेंदर खन्ना भी गृह मंत्री जैसे ही बयानों की दौड़ में शामिल हो चुके हैं।

क्या देश का कानून ऐसे जिम्मेदार मंत्री और नेताओं के खिलाफ कुछ नहीं कर सकता। क्या ऐसे बयानों पर इनके खिलाफ कानूनी कार्यवाही नहीं करनी चाहिए। लेकिन सरकार को देश की एकता और अखंडता से लगाव नहीं और ना ही शासन चलाने की मंशा तभी तो हुर्रियत नेता गिलानी और अरूंधति रॉय के कश्मीर पर दिए देश विरोधी बयानों में सरकार को कुछ गलत दिखाई नहीं दिया। वहीं अफजल गुरू की फाइल लटका कर उसे फांसी पर लटकने नहीं दे रही है।

अब ये तस्वीर बिल्कुल साफ हो चली है कि सरकार नाकारा है। सत्ता में बने रहने के लिए आम लोगों की बलि चढ़वा रही है। अपनी अक्षमता से सरकार ने विपक्ष एकजुट होने में खूब मदद की है जो सरकार को किसी भी मुद्दों पर पछाड़ने के लिए तैयार बैठी है। इन नेताओं के बयानों से कहीं इतने हालात न बिगड़ जाएं कि ये दशकों तक सत्ता को सुख न भोग पाए। राजनीति के इन महान नेताओं देश की जनता का अपमान का कोई हक नहीं बनता ऐसे नेता दोबारा सत्ता में न आ पाए जिसके लिए हम,आपको ही प्रयास करने होंगे।

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Thursday, December 2, 2010

क्या सत्ता के दलाल बनते जा रहे हैं पत्रकार?

2:23 PM

बुरे फंसे प्रभु, वीर और बरखा

लोकतंत्र का चौथे स्तंभ पत्रकारिता में गुंडे तो पहले से थे ही अब दलाल भी घुस गए हैं। अधिकतर मीडिया समूह अब दलाली का अखाड़ा बन गए हैं। ऐसा कुछ दिनों पहले कॉरपोरेट घरानों के लिए काम करने वाली नीरा राडिया के साथ अख़बारों और टेलिवीज़न के नामचीन पत्रकारों की बातचीत के टेप प्रकाशित किए गए थे जिनमें ये पत्रकार डीएमके के नेता . राजा को मंत्रिमंडल में शामिल करवाने की पैरवी करते नज़र आए या फिर अंबानी बंधुओं के झगड़े में पक्ष लेते नज़र आए। ये सभी मीडिया के मठाधीश माने जाते हैं जिनकी बातों पर लोग आंखें मूंदकर विश्वास कर लते हैं, इन टेपों से मीडिया जगत में सनसनी मची हुई है, जिनके नाम इन टेप में आए है जिनमे प्रमुख रूप से प्रभु चावला आजतक से, वीर सांघवी, एचटी मीडिया और एनडीटीवी की पत्रकार बरखा दत्त शामिल हैं।
 
रतन टाटा क्यो छिपा रहे हैं राडिया के राज
कॉरपोरेट घरानों की दलाली के आरोपों के चलते पूरे मीडिया जगत को शक की नजर से देखा जाने लगा है। नीरा राडिया ने .राजा को मंत्री बनने के लिए लॉबिंग कराए जाने के पीछे क्या मकसद था हजारों करोड़ के घोटाले के बाद ये पता चल ही गया। कॉरपोरेट घरानों में नाम आने से टाटा और अंबानी की भी फजीहत हुई है, राडिया के साथ टेप का खुलासा होने के बाद आखिर रतन टाटा इतना बौखलाए क्यों घूम रहे हैं, टेप में ऐसा क्या है जिसने रतन टाटा की नब्ज पकड़ ली है। फिलहाल 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है जहां सुप्रीम कोर्ट ने प्रधानमंत्री और .राजा समेत सरकार को बचाने वाली सीबीआई को कटघरे में खड़ा कर दिया। अपनी तीखी टिप्पणियों में कोर्ट ने कहा- सरकार भ्रष्टाचार पर काबू करने में नाकाम है। सरकार की भ्रष्टाचारी पॉलिसी किस हद तक कारगर साबित हो रही है इसका अंदाजा इसी बात से हो गया जब उसने भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे पीजे थॉमस को पहले तो सीवीसी बनाया, लेकिन जब बात 2जी स्पेक्ट्रम मामले की जांच की आई तो विरोध के बाद थॉमस को घोटाले की जांच से बाहर कर दिया। वाह री सरकार...अब सीवीसी जैसे पदों पर बैठे लोग भी खाएंगे और खिलाएंगे

राजा तूने क्या किया, मुझे ही ले डूबा

भ्रष्टाचार का सरकारी नंगापन इस हद तक बढ़ गया है कि सरकार बचाने के लिए सत्ता मोही कांग्रेस पार्टी देश को बेचने के लिए तैयार बैठी है। फिर चाहे वह आदर्श सोसायटी घोटाला हो, कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाला हो या फिर 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला, सरकार भरी बैठी है हर किसी को एक मौके जरूर दे रही है। लेकिन मीडिया में मचा हडकंप इस बार जल्द शांत होते नहीं दिखता। पत्रकारों की मांग है कि भ्रष्टाचारी राजा का साथ देने वाले वरिष्ठ पत्रकारों की पूरी सच्चाई देश के सामने जरूर आनी चाहिए ताकि इस प्रोफेशन से गुंडे और दलालों की विदाई हो सके। इस विवाद के बाद सबसे बड़ा सवाल ये उठने लगा है कि क्या पत्रकार सत्ता को आइना दिखाने और उसे सच की कसौटी पर कसने की बजाए सत्ताधीशों के लिए बिचौलिए का काम करने लगे हैं? जो पत्रकार समाज तक सच पहुँचाने का दावा करते हैं वो अगर उद्योगपतियों और नेताओं के लिए संदेशवाहक का काम करने लगेंगे तो क्या जनता आज़ाद प्रेस पर भरोसा बरकरार रख पाएगी?

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Thursday, September 9, 2010

कहिए प्रधानमंत्री जी कब इस्तीफा दे रहे हैं ?

7:59 PM

जयपुर के एक गांव फागी में सरकारी कंपनी बीएसएनएल ने 1हजार बीपीएल परिवारों को मुफ्त मोबाइल बांटे। लेकिन राजस्थान सरकार ने इन्हीं बीपीएल परिवारों को मिलने वाले गेहूं का कोटा 35 किलो से घटाकर 25 किलो कर दिया। जरूरत अनाज की थी लेकिन सरकार को लगता है इन लोगों को रोटी से ज्यादा मोबाइल की जरूरत है। राज्य में बीपीएल धारकों की संख्या 24 लाख है, फिर सरकार ने केवल 1हजार लोगों को ही मुफ्त मोबाइल क्यों बांटे। बीपीएल परिवारों को बांटे गए मोबाइल का उपयोग वे कितना कर पाते हैं ये तो वक्त ही बताएगा लेकिन गरीबी दूर करने के सरकार के ऐसे प्रयासों से तो ऐसा ही लगता है कि सरकार गरीबी का केवल मजाक उड़ा रही है।
 

संसद में पक्ष-विपक्ष का काम एक दूसरे पर आऱोप लगाना और छींटाकशी करना रह गया है, लेकिन सदन के बाहर भी ये जन प्रतिनिधि मौके नहीं चूकते और गाहे बगाहे मीडिया के सामने अपनी भड़ास मिटाते रहते हैं। ऐसे ही एक टीवी शो में सीपीआई नेता अतुल अंजान ने सरकार को गैर पढ़े लिखों की जमात कह दिया, ये बयान ज्यादा सुर्खियां तो नहीं बटोर सका लेकिन केंद्र को एक आईना जरूर दिखा दिया। भंडारण की कमी का रोना रो रही केंद्र सरकार को सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था “यदि अनाज को रखने की जगह नहीं है सड़ाने से अच्छा है गरीबों में बांट दिया जाए”। लेकिन केंद्र के बिजी मंत्री शरद पवार को सुप्रीम कोर्ट का आदेश,आदेश नहीं सलाह लगी। शरद पवार कन्फ्यूज हो गए और कह दिया,“सुप्रीम कोर्ट ने हमें सुझाव दिया है,ऐसा करना आसान नहीं है”। जब कार्यवाही नहीं हुई तो सुप्रीम कोर्ट ने फिर सरकार को डांट पिलाई। लेकिन सरकार डांट खाने के बाद भी सरकार नहीं सुधरी...अबकी बार मैदान में स्वयं पीएम उतर गए। मनमोहन सिंह ने कहा कि “अनाज गरीब परिवारों में नहीं बांटा जा सकता,न्यायपालिका सरकार की नीतियों में दखल न दे”। बिल्कुल सही कहा..कानून बनाने वालों को कोई कानून सिखाए तो गुस्सा तो आएगा ही,अनाज मत लो मोबाइल ले लो,मोबाइल से बात करोगे तो पेट भर जाएगा। फिर महंगाई के मुद्दे पर बोले प्रधानमंत्री, “मुझे नहीं पता महंगाई कब कम होगी मैं कोई ज्योतिष नहीं हूं” अरे भाई आप ज्योतिष नहीं है तो सरकार क्यों चला रहे हैं। हमारे देश में लोग प्रधानमंत्री को किसी ज्योतिष से कम नहीं समझते हैं जिसे सब कुछ पता होता। है।

सरकार दिन पर दिन असंवेदनशील होती जा रही है, मंत्रियों की बातें तो बेलगाम थी हीं. अब पीएम भी इस वाकयुद्ध में कूद पड़े हैं। कॉमनवेल्थ में घोटाले का दंश,कश्मीर में विद्रोह और महंगाई से हार चुकी सरकार को अपना भविष्य अंधकारमय नजर आ रहा है। सरकार के मंत्री अपनी शर्तों पर काम करते हुए औने पौने बयान दे रहे हैं,मंत्रियों के लिए कभी भगवा रंग आतंक का पर्याय बन जाता है तो कभी हार्डकोर नक्सली के मारे जाने की जांच की बात कही जाती है। दोहरे चरित्र वाली सरकार ने आईपीएल में नाम आने पर थरूर को थलग कर दिया लेकिन घोटालों के महाराजा ए.राजा का पावर अभी भी बरकरार रखा है। यूपीए अध्यक्ष कहती है किसानों के हितों का ख्याल रखा जाए। लेकिन कैसे, जिस किसान का कोई खैरख्वाह नहीं, उस की जमीन पर राजनीति हो रही है उसकी जमीन छीनकर उसे जबर्दस्ती करोड़पति बनाया जा रहा हैं सरकार के पास अब मुद्दे नहीं हैं किस मुंह से बिहार,बंगाल चुनाव लड़ेगी पता नहीं। सरकारी योजनाओं में भ्रष्टाचार चरम पर है,सरकारी नीतियां खोखली साबित हो रही है,खाद्यान्न बढ़ रहा है,साथ-साथ महंगाई की मार भी बढ़ी है। बिचौलियों के हाथों की कठपुतली बन चुकी सरकार के पास खुद बचाने का छोड़ो भागने का भी रास्ते नहीं बचा है। हमारे शांत स्वभावी अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री की नीतियां गड़बड़ा रही हैं क्या यही उनकी बौखलाहट का कारण भी बन रही है। ऐसे वक्त में ये बात मनमोहन सिंह के लिए बिल्कुल फिट बैठती नजर आती है... कहिए प्रधानमंत्री जी कब इस्तीफा दे रहे हैं।


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Thursday, August 12, 2010

ममता का 'लाल' सलाम

11:42 PM

                         पश्चिम बंगाल में अगले साल विधानसभा चुनाव होने ऐसे में ममता बनर्जी ने चुनावी तैयारियां शुरू कर दी हैं।नक्सलियों के गढ़ 'लालगढ़' में ममता बनर्जी ने रैली करके कांग्रेस और वामपंथियों को अपनी ताकत का नजारा दिखा दिया। रैली तृणमूल की थी लेकिन रैली में जनान्दोलनों के सबसे बड़े नेता या कहें नक्सल समर्थकों को विशेष रूप से आमंत्रित किया गया। रैली में स्वामी अग्निवेश,मेधा पाटकर और महाश्वेता देवी जैसी बुद्धिजीवियों ने शिरकत की। बंगाल की गद्दी पर बैठने का सपना संजोए ममता बनर्जी को रैली में नक्सलियों का खुला समर्थन मिला,नक्सली समर्थक संगठन पीसीएपीए के कई कार्यकर्ता भी रैली में शामिल हुए।

रैली में ममता ने नक्सली नेता आजाद की मौत पर सवाल उठाए

ममता बनर्जी ने रैली में माओवादियों के प्रति खूब सहानुभूति दिखाई। ममता ने लालगढ़ रैली में कहा- 'नक्सली हिंसा का रास्ता छोड़ें और सरकार से बातचीत के लिए आगे आएं। हम उनकी बात सुनेंगे, राज्य सरकार नक्सलवाद को कुचलने के नाम पर लोकतांत्रिक मूल्यों को कुचल रही है. इसी के विरोध में ये रैली है' । ममता ने मुठभेड़ में मारे गए नक्सली नेता आजाद की हत्या को गलत ठहराया। माओवादी नेता किशनजी ने ममता की रैली को पूरा समर्थन दिया और कई पीसीएपीए नेता रैली में मौजूद दिखे।

  ममता की रैली में इस भीड़ का मतलब क्या वामपंथियों का सफाया है 
ममता की रैली में मेधा पाटकर ने अपने तल्खी भरे शब्दों से केंद्र को सूचित किया कि सरकार को भूमि अधिग्रहण के तौर तरीके बदलने होंगे। चंद लोगों को मुनाफा देकर सरकार विकास की बातें कर रही है। अब ये बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। वहीं नक्सलियों के सबसे बड़े समर्थक स्वामी अग्निवेश ने कहा "जब तक ग्रामीण आदिवासियों की जमीनों पर कब्जे बंद नहीं होंगे लड़ाई जारी रहेगी चाहे वह बंदूक से हो या शांति से। नक्सलियों की लड़ाई स्वाभिमान की लड़ाई है। लालगढ़ की रैली में इन अपने भड़काने वाले भाषणों से नक्सलियों का मनोबल और बढ़ा है।

मेधा पाटकर के साथ स्वामी अग्निवेश
पश्चिम बंगाल में लोकसभा चुनाव में टीएमसी की भारी सफलता के बाद निकाय चुनाव में पार्टी ने झंडे गाड़े। पार्टी की इस जीत से ममता को अपना बंगाल पर कब्जे का अपना सपना सच नजर आता दिखने लगा।कोलकाता से रेल मंत्रालय चलाने वाली ममता बनर्जी ने अपनी जिद को हमेशा प्राथमिकता दी। सिंगूरमें आदिवासियों के जमीन के लिए ममता ने एक लंबी लड़ाई लड़ी। ममता की वजह से टाटा को
जाना पड़ा और हजारों लोगों के पेट पर लात मारकर ममता बनर्जी ने साबित कर दिया कि वह सत्ता को हासिल करने के दाव पेंच सीख गई हैं।लेकिन क्या लालगढ़ को सिंगूर की तरह भुनाना चाहती है ममता। सिंगूर में आदिवासियों की लड़ाई थी लेकिन यहां नक्सलवाद राष्ट्रव्यापी लड़ाई है।


लगातार जारी हैं नक्सलियों के हमले
नक्सलियों पर सरकार द्वारा चलाए जा रहे ऑपरेशन ग्रीन हंट में सैकड़ों सुरक्षाबलों की मौत हो चुकी है। नक्सलियों की इन आतंकी घटनाओं के बाद भी ममता के मुंह से कभी भी उन जवानों के परिवारों के लिए दो शब्द नहीं फूटे। लेकिन लालगढ़ की रैली में नक्सली नेता आजाद के मारे जाने पर ममता ने सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया यही नहीं ममता ने नक्सली नेता आजाद की मौत की जांच करवाने तक की बात कह दी।

गरीबों को सपने दिखाते नक्सली
नक्सलियों ने कई बार  ट्रेनों को निशाना बनाया,जिसमेंसैकड़ों  यात्रीमारे गए,लेकिन ममता  ने नक्सलियों का पक्ष लिया और कर्मचारियों पर ही सवाल उठाए। ममता दीदी का ये नक्सली प्रेम कई लोगों को खटक रहा है।कई राज्यों में आए दिन बड़ी वारदातें करने वाले नक्सलियों से देश में आतंक और भय का महौल बना हुआ है ऐसे में लालगढ़ में रैली को एक चुनावी का चुनावी स्टंट ही है।्,जिस बात की लड़ाई वे लड़ रहे हैं उससे उनकी नीतियां कोसो दूर चली है। नक्सलियों के घिनौनापन अपने चरम पर है।

अपनी मांगों पर मिटने के लिए तैयार नक्सली
नक्सलियों को अपने इतना करीब कर लेने वाली ममता के लिए ये राह भी आसान नहीं है ममता वामपंथी पार्टियों और केंद्र सरकार के लिए आंख की किरकिरी बनती जा री रही हैं। वाम दलों का कहना है ममता सिर्फ वोट बैंक की राजनीति कर रही हैं उन्हें बंगाल की जनता पर भरोसा नहीं है। इसलिए ममता नक्सलियों के दम पर चुनाव में उतरने की सोच रही हैं। सत्ता का स्वाद चखने के लिए नक्सलियों को साथ लेना चाहती हैं ममता। कहा ये भी जा रहा है सत्ता में आने के बाद नक्सलियों   को ठेंगा दिखा देंगी। सीपीएम के मुताबिक नक्सलियों और ममता के बीच सांठगांठ अब साफ दिख चुकी है। वामपंथियों ने केंद्र सरकार से अपना रुख साफ करने को कहा है।केंद्र माओवादियों के खिलाफ आए दिन नई रणनीति बना रहा है, लेकिन अब उसकी प्रमुख सहयोगी पार्टी ही नए नक्सलियों का समर्थन कर रही है। लालगढ़ में यह रैली कांग्रेस और तृणमूल को मिलकर करनी थी।लेकिन आखिरी वक्त में कांग्रेस ने अपने हाथ वापस खींच लिए। कांग्रेस को डर है कि कहीं विपक्षी पार्टियां इसे सत्ताधारी पार्टी की नाकामी न बताए। यह सब ऐसे वक्त में हो रहा है जब सुरक्षाकर्मियों पर माओवादियों के बड़े हमले हो चुके हैं।ममता लंबे समय से राजनीति में हैं लेकिन लालगढ़ में ममता का ये लाल सलाम मतभेदों कम करने में सहायक तो कतई नहीं था।सत्ता को सुख किस नेता को प्यारा नहीं होता है। लेकिन सत्ता के लिए देशद्रोहियों से हाथ मिलाना कहां तक जायज है।

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