Thursday, May 6, 2010

अंत भला तो सब भला

9:02 AM

अंत भला तो सब भला, कहावत है लेकिन किसी का अंत भी बुरा हो और शुरूआत भी बुरी तो भला कहां सो होय। मुझे याद है 26 नवंबर का वो दिन जब मैं अपने घर झांसी से लौटा था। दफ्तर में मेरी नाइट शिफ्ट लगा दी गई। रात 10 बजकर 15 मिनट पर दफ्तर पहुंचा, चैनल की सीढ़ियां चढ़ ही रहा था, किसी मीडियापर्सन ने मुझे खबर दी, एक खबर आई है, मुंबई में गैंगवार चल रही है। मैं अपनी डेस्क पर पहुंचा तो देखा मुंबई में फायरिंग हो रही है और अलग चैनल्स पर अलग-अलग खबरें आ रही हैं। कोई कह रहा था गैंगवार तो कोई कह रहा था आतंकी हमला। लगभग 1 घंटे बाद सरकार ने आतंकी हमले की पुष्टि कर दी। ये हमला अप्रत्याशित था, किसी भी शख्स को ये यकीन नहीं हो पा रहा था कि ये आतंकी हमला है। और धीरे धीरे ये भारत पर सबसे बड़ा हमला बन गया, पाकिस्तान के कराची से समुद्र के रास्ते आए 10 आतंकियों ने मुंबई शहर में कत्लेआम मचाया, ताज, ट्राइडेंट होटलों पर कब्जा कर बेगुनाह लोगों को मारा, लगभग 59 घंटों मुंबई शहर आतंकियों के खौफ के साए में जीता रहा। एनएसजी ने अपना काम बखूबी किया, हमले में 166 लोग मारे गए, जिसमें 25 विदेशी थे। मैंने इससे पहले शायद ही इतना बड़ा ऑपरेशन शायद ही पहले कभी देखा था। इस कार्रवाई में एक आतंकी अजमल आमिर कसाब को हमारे सुरक्षाबलों ने गिरफ्तार किया। मैं दफ्तर में लगातार 2 दिन ऑपरेशन की खबरों के बीच गुजारे, उन्हें खबरों और उनकी विश्वसनीयता को करीब से जाना, आतंकी हमले से जुड़ी एक एक खबर जनता तक पहुंचाई। एक जंग जैसा था सब कुछ। आज मुझे फिर वही दिन याद आया है खुशी है कि कोर्ट ने कसाब को उसके कर्मों की सजा के फांसी के रूप में सुनाई है। आज फिर वही चैनल है, फिर वही कुर्सी है, बस बदल गया है वक्त.

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