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Sunday, August 15, 2010
35 साल के 'शोले'
5:01 AM
15 अगस्त 1975 को रिलीज हुई फिल्म "शोले" को प्रदर्शित हुए आज 35 साल हो गए। साढ़े तीन दशक का लंबा समय बीत जाने के बाद भी शोले के गब्बर, जय, वीरू और बसंती का जादू अब भी बरकरार है। शोले ने आज भी भारतीय जनमानस में अपनी छाप गहराई तक छोड़ रखी है। कितनी ही फिल्में आईं लेकिन आम दर्शकों से लेकर फिल्म विशेषज्ञों के जेहन से 35 साल बाद भी ‘शोले’ ही निकलती ही नहीं। देश के लोगों के दिल में बसी इस फिल्म के डायलॉग्स को आज भी अपनी बातों में शामिल करते हैं और छोटे से छोटा किरदार भी विज्ञापनों, प्रोमो, फिल्मों या धारावाहिकों में नजर आ जाता है।
निर्देशक रमेश सिप्पी की अविस्मरणीय फिल्म शोले के गब्बर, जय, वीरू और बसंती का जादू अब भी बरकरार है। फिल्म शोले में 2 दोस्तों की कभी न खत्म होने वाली दोस्ती, एक विधवा का खामोश प्यार। एक तांगे वाली का बड़बोलापन। एक आदर्शवादी पुलिस अफसर का संघर्ष। एक डाकू की दिखाई गई हकीकत लोगों के दिलों मे आज भी बसी हुई है।
संजीव कुमार, अमिताभ बच्चन, धर्मेंद्र, जया भादुड़ी, हेमामालिनी ने जो अदाकारी की है वो आज किसी फिल्म में देखने को नहीं मिलती।इसी फिल्म से अमजद खान जैसे नए अभिनेता की एक खास पहचान बनी। वह हिंदी सिनेमा में एक सबसे प्रख्यात खलनायक बन गए। फिल्म बनने से पहले अमजद खान इस रोल के लिए दूसरे विकल्प के तौर पर थे। निर्माता गब्बर के किरदार के लिए डैनी डेंग्जोपा को लेना चाहते थे लेकिन डैनी व्यस्त थे। अंत में फिर अमजद खान को ही ‘गब्बर’ के लिए चुना गया। फिल्म में असरानी,जगदीप और एक संवाद बोलने वाले मैकमोहन भी लोगों की यादों में बस गए। शोले में जगदीप ने सूरमा भोपाली का किरदार निभाया था जो आज भी दर्शकों को ठहाके लगाने पर मजबूर कर देता हैं। शोले में ए.के.हंगल से लेकर कालिया बने विजु खोटे ने अपने अभिनय से लोगों का दिल जीता। फिल्म में “तेरा क्या होगा कालिया डायलॉग” आज भी बड़ा लोकप्रिय है। यही नहीं शोले में केवल एक संवाद बोलने वाले मैकमोहन ने फिल्म में अपनी अमिट छाप छोड़ी जिसे कोई भुला नहीं सकता।
फिल्म में जेलर का किरदार निभाने वाले असरानी ने अग्रेजों के जमाने की खूब याद दिलाई। दर्शकों ने असरानी के रोल को खूब पसंद किया। असरानी को बाद कई फिल्मों इसी तरह के रोल करते नजर आए। शोले में जेल में सुरंग बनाने वाले सीन में दर्शकों को हंस हंस कर लोटने पर मजबूर ही कर दिया था।
| सूरमा भोपाली बने जगदीप और अग्रेजों के जमाने के जेलर असरानी की जबर्दस्त कॉमेडी |
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| शोले के निर्देशक रमेश सिप्पी |
फिल्म को शुरूआत में फिल्म आलोचकों ने नकार दिया। लेकिन शोले की सफलता ने आलोचकों का मुंह बंद कर दिया। फिल्म की शूटिंग जिस गांव में हुई थी, गांववालों ने उसका नाम सिप्पीनगर रख दिया था। वर्ष 2006 में आयोजित 50वें फिल्मफेयर अवॉर्ड में इसे ‘बेस्ट फिल्म ऑफ 50 ईयर्स’ का अवॉर्ड मिला था। इस फिल्म को बीबीसी ने भी ‘फिल्म ऑफ द मिलेनियम’ घोषित किया था। शोले एक कम्पलीट फिल्म थी। इसमें हंसी-मजाक, ड्रामा, एक्शन और लव स्टोरी सबकुछ था। यह तो परिवार के साथ ही देखने लायक भरपूर आनंद से लबरेज फिल्म रही है। इसकी खासियत इसकी स्क्रिप्ट थी जो हर मोमेंट पर अलग ही रोमांच देती है। यदि इन ३५ सालों की बात करें तो मुझे नही लगता कि शोले से किसी भी फिल्म की तुलना की जा सकती है। शोले सर्वश्रेष्ठ फिल्म थी, है और रहेगी।
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