Monday, June 28, 2010
Categorized | ब्रेकिंग न्यूज, राजनीति
“घुटघुट कर जी रही जनता, घूंटघूंट पी रही सरकार” !
3:30 PM
ये तस्वीरें याद दिलाती है यूपीए सरकार में हुए घटनाक्रमों की... पिछले 6वर्षों से सत्ता का सुख भोग रही सरकार ने एक साल में चार बार तेल के दामों में वृद्धि करके आम आदमी की कमर तोड़ दीहै। हालिया बयान में वित्त मंत्री ने कहा है कि महंगाई अभी और बढ़ेगी। इन फैसलों से सरकार की तानाशाही नियति साफ नजर आ रही। पिछले कई सालों से लगातार महंगाई से जूझती जनता को इससे मुक्ति कब मिलेगी ये कहना नामुमकिन सा हो गया है। खाद्य पदार्थों से लेकर रोजमर्रा की वस्तुओं के लगातार दाम बढ़ने से आम आदमी नरकीय जीवन जीने को मजबूर है। उसे कहीं से भी उम्मीद की एक किरण नजर नहीं आ रही। गरीबी,महंगाई बेरोजगारी ने आज पूरे देश को जकड़ रखा है फिर भी सरकार नहीं चेत रही मनमानी किए जा रही है।
दोषी कौन है आज नगर हो, महानगर हो, कस्बा या गांव सभी जगह लोग त्रस्त हैं। शहरों में लोग बेबसी की जिंदगी जी रहे हैं। गांव में पनप रही बेरोजगारी को सरकार बेरोजगारी नहीं समझती इसलिए गांव के लोगों का शहरों में पलायन नहीं रोक पा रही। मनरेगा जैसी कई बड़ी योजनाएं भ्रष्टाचारियों की वजह से खत्म सी होती जा रही हैं। देश के कई राज्यों में भूख से मरने वाले लोगों में वृद्धि लगातार हो रही है। औद्योगिक घरानों को गरीबों की जमीन छीन कर उनका व्यवसायीकरण करने की खुली छूट दे रही है। नक्सली हमलों में सैकड़ों जवानों की मौत, लेकिन ठोस कार्रवाई नहीं। आतंकियों पर नरम रवैया सरकार का प्रमुख एजेंडा,जिसको विपक्ष भरे संसद में कह चुका है। दफ्तर में बाबुओं को फाइलें दबाते को बहुत सुना था अब तो आतंकियों की भी फाइलें दबा कर बैठ जाती है सरकार। विदेश नीति में लचर रवैया,पाकिस्तान के साथ वार्ता...फिर भी सीमापार से घुसपैठ में 60फीसदी का इजाफा। परमाणु समझौते को चुपके से कर तो लिया..फल हमारी कौन सी पीढ़ी भोगेगी कोई नहीं जानता। अमेरिकी राजनीतिक दबाव में घुटनों के बल चलते रहना। खेलों में राजनेताओं की सरकारी दादागीरी। अपने हितों के लिए खेलों को धंधा बनाने का चलन। बड़े गेम्स कराने के लिए बड़ा पैसा, उगाई जनता के पेट से,बाजार में महंगाई के नाम पर नए कर लगाकर अ-वैध रूप से धन की उगाही करना। साल के बजट में 2 रोटी, आधा कटोरी चावल, 100 रुपए किलो वाली 1 कटोरी दाल भी ठीक तरह से लोगों को मुहैया न करा पाना। घर, मकान की इतने महंगे, कि आम आदमी का सिर्फ मन को मसोस कर रह जाना। खापों को समर्थन से समाज में रुढ़ीवादी लोगों का वर्चस्व सामने लाना। मॉल संस्कृति को और उदारवादी बनाने के लिए भरपूर पैसा खर्च करना। त्रासदियों पर खुद को फंसता देख हजारों करोड़ों देकर जनता मुंह बंद करवा देना।
चुनाव आते सरकार के नुमाइंदे बरसाती मेढ़कों की तरह जनता में नेताओं का आना और भोली भाली जनता को मूर्ख बनाना। पार्टी के लिए चंदा देने वालों की नई लिस्ट बनाना और फिर उसी पैसे से गांव,गांव घूमकर गरीब को झूठे वादों से बरगलाना। फिर चुनाव जीते तो सीधे 5साल तक शक्ल नहीं दिखाना। जनता चाहे तो भी कुछ नहीं कर सकती..क्योंकि युवराज ने कह दिया राजनीति में दबंग और पैसे वाले ही आते हैं, गरीब, आदिवासियों का यहां कोई काम नहीं है। दल कोई भी हो सत्ता मे कोई भी दल हो, चाहे कोई भी नेता हो यही सोचता है गद्दी मिले तो सब बराबर कर देंगे। न देश में गरीब रहेंगे और न रहेगी गरीबी। हम ऐसी ही सरकारें चुनते हैं और हम ही बेबसी का रोना रोते हैं। दोषी हम हैं तो सरकार को कोसना कहां तक न्यायोचित है। सरकार तो अखबार में अपनी उपलब्धियों और उदघोषणाओं का विज्ञापन छपवाकर फुर्सत हो जाती है, लेकिन गरीबों के लिए वह अखबार रोटी रखने का कागज मात्र बन कर रह गया है।
दोषी कौन है आज नगर हो, महानगर हो, कस्बा या गांव सभी जगह लोग त्रस्त हैं। शहरों में लोग बेबसी की जिंदगी जी रहे हैं। गांव में पनप रही बेरोजगारी को सरकार बेरोजगारी नहीं समझती इसलिए गांव के लोगों का शहरों में पलायन नहीं रोक पा रही। मनरेगा जैसी कई बड़ी योजनाएं भ्रष्टाचारियों की वजह से खत्म सी होती जा रही हैं। देश के कई राज्यों में भूख से मरने वाले लोगों में वृद्धि लगातार हो रही है। औद्योगिक घरानों को गरीबों की जमीन छीन कर उनका व्यवसायीकरण करने की खुली छूट दे रही है। नक्सली हमलों में सैकड़ों जवानों की मौत, लेकिन ठोस कार्रवाई नहीं। आतंकियों पर नरम रवैया सरकार का प्रमुख एजेंडा,जिसको विपक्ष भरे संसद में कह चुका है। दफ्तर में बाबुओं को फाइलें दबाते को बहुत सुना था अब तो आतंकियों की भी फाइलें दबा कर बैठ जाती है सरकार। विदेश नीति में लचर रवैया,पाकिस्तान के साथ वार्ता...फिर भी सीमापार से घुसपैठ में 60फीसदी का इजाफा। परमाणु समझौते को चुपके से कर तो लिया..फल हमारी कौन सी पीढ़ी भोगेगी कोई नहीं जानता। अमेरिकी राजनीतिक दबाव में घुटनों के बल चलते रहना। खेलों में राजनेताओं की सरकारी दादागीरी। अपने हितों के लिए खेलों को धंधा बनाने का चलन। बड़े गेम्स कराने के लिए बड़ा पैसा, उगाई जनता के पेट से,बाजार में महंगाई के नाम पर नए कर लगाकर अ-वैध रूप से धन की उगाही करना। साल के बजट में 2 रोटी, आधा कटोरी चावल, 100 रुपए किलो वाली 1 कटोरी दाल भी ठीक तरह से लोगों को मुहैया न करा पाना। घर, मकान की इतने महंगे, कि आम आदमी का सिर्फ मन को मसोस कर रह जाना। खापों को समर्थन से समाज में रुढ़ीवादी लोगों का वर्चस्व सामने लाना। मॉल संस्कृति को और उदारवादी बनाने के लिए भरपूर पैसा खर्च करना। त्रासदियों पर खुद को फंसता देख हजारों करोड़ों देकर जनता मुंह बंद करवा देना।
चुनाव आते सरकार के नुमाइंदे बरसाती मेढ़कों की तरह जनता में नेताओं का आना और भोली भाली जनता को मूर्ख बनाना। पार्टी के लिए चंदा देने वालों की नई लिस्ट बनाना और फिर उसी पैसे से गांव,गांव घूमकर गरीब को झूठे वादों से बरगलाना। फिर चुनाव जीते तो सीधे 5साल तक शक्ल नहीं दिखाना। जनता चाहे तो भी कुछ नहीं कर सकती..क्योंकि युवराज ने कह दिया राजनीति में दबंग और पैसे वाले ही आते हैं, गरीब, आदिवासियों का यहां कोई काम नहीं है। दल कोई भी हो सत्ता मे कोई भी दल हो, चाहे कोई भी नेता हो यही सोचता है गद्दी मिले तो सब बराबर कर देंगे। न देश में गरीब रहेंगे और न रहेगी गरीबी। हम ऐसी ही सरकारें चुनते हैं और हम ही बेबसी का रोना रोते हैं। दोषी हम हैं तो सरकार को कोसना कहां तक न्यायोचित है। सरकार तो अखबार में अपनी उपलब्धियों और उदघोषणाओं का विज्ञापन छपवाकर फुर्सत हो जाती है, लेकिन गरीबों के लिए वह अखबार रोटी रखने का कागज मात्र बन कर रह गया है।
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