Monday, December 13, 2010

देश का अपमान, फिर भी हमारे नेताजी महान !

10:37 PM

 आज कल कांग्रेस पार्टी के नेताओं की मनोदशा दिन पर दिन बिगड़ती ही जा रही है। कांग्रेस के बड़े बड़े महारथी लगातार धर्म,आतंकवाद पर गैर जरूरी बयान देकर देश के लोगों को गुमराह करने में लगे हुए हैं। जिससे अराजकता का महौल पैदा हो रहा है। अपराध हो या आतंकवाद दोनों पर लगाम लगाने की बजाय जनता को मूर्ख बनाकर भ्रष्टाचार के गंभीर मुद्दों से भटकाया जा रहा है। मंत्री हो या महासचिव सभी ने ठान ली है कि काम नहीं करेंगे सिर्फ बयान देंगे। जिससे भ्रष्टाचार में फंसी कांग्रेस सरकार को कुछ तो राहत दे सकें। अपराधियों और आतंकियों को प्रोमोशन दे रही सरकार के बेलगाम होते मंत्री अपने बयानों में अब देश को तोडने वाली भाषा इस्तेमाल भी कर रहे हैं।कांग्रेसी नेताओं ने आतंकवाद और अपराधीकरण पर औने-पौने बयान देकर इनकी परिभाषाएं ही बदल दी हैं। ऐसे ही कुछ किया है वरिष्ठ कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह और गृहमंत्री चिदंबरम ने जो कि देश विरोधी बयान देने के मामले में बुरी तरह फंस गए हैं।


दिग्गी राजा इस बार बुरे फंसे हैं, कहीं पार्टी से हाथ ना धो बैठें

दिग्विजय सिंह ने मुंबई हमले में मारे गए शहीद हेमंत करकरे पर दिए बयान में कहा-“हेमंत करकरे को हिंदू आतंकवादियों से बड़ा खतरा था। मुंबई हमले के कुछ घंटे पहले मेरी उनसे बात हुई थी, लेकिन रिपोर्ट में कहा गया की पाकिस्तानी आतंकियों की गोली मारी”।दिग्विजय सिंह जैसे नेता जिनके विवादास्पद बयानों से कांग्रेस को कई बार शर्मिंदा होना पड़ा है इस बार भी कांग्रेस ने उनका निजी बयान बताकर पल्ला झाड़ लिया लेकिन दिग्गी राजा तो अड़े हुए हैं। सबूत देने की बात कर रहे हैं। लेकिन सवाल ये उठता है उन्होंने कैसे इस बात को 2 साल तक पचाए रखा।

शहीद एटीएस चीफ हेमंत करकरे की पत्नी
दिग्विजय ने मुंबई हमले की याद फिर ताजा करके शहीद करकरे की विधवा पर सैंकड़ों तीरों की तरह वार किए हैं,बजाय माफी मांगने के दिग्विजय सिंह ने बीजेपी पर ही आरोप जड़ दिए। बात सही है कांग्रेस का पुराना चलन है,चोरी तो चोरी ऊपर से सीना जोरी...। क्या ये आतंकवाद का धर्मों में बंटवारा करके देश को बांटने की ओर इशारा है या फिर सुर्खियों बने रहने के लिए एक मनगढ़ंत कहानी है। करकरे पर बयान देना दिग्गी राजा के लिए कितना खतरनाक साबित होता है ये तो आनेवाला वक्त ही बताएगा लेकिन दिग्विजय साहब को देश की जनता को ये बताना होगा कि हिंदु आतंकवाद क्या होता है, मुस्लिम, सिख और ईसाई आतंकवाद क्या होता है।

खैर की क्या कहें हमारे गृह मंत्री का भी हाल यही है...चिदंबरम को मुंबई में हमले के बाद गृह मंत्री की गद्दी दी गई थी। जनता को शिवराज पाटिल जैसे वीआईपी गृह मंत्री की नाकामी के बाद चिदंबरम से काफी कुछ उम्मीदें थीं। लेकिन चिदंबरम भी देश को जोड़ने के बजाय तोड़ने वाले बयान दे रहे है।

शर्मसार होती देश की राजधानी
दिल्ली में बढ़ते अपराध को रोकने में नाकाम चिदंबरम साहब ने जनता पर ही धावा बोल दिया। जिसकी सुरक्षा व्यवस्था की जिम्मेदारी स्वयं उनके मंत्रालय की है। अपने बयान में कहा..“दिल्ली में बाहर आए लोग अनाधिकृत कॉलोनियों में बस गए है वही दिल्ली में अपराध कर रहे हैं”। इस बयान के बाद पूरे देश चिदंबरम की ऐसी भद्द पिटी जिसके बाद उन्हे 3 घंटों के भीतर उनकी ओर बयान वापस लेने की खबर आ गई।
बोलती बंद.. गृह मंत्री कह रहे हैं अब कभी कुछ नहीं बोलूंगा

विपक्ष और सत्ता पक्ष के भारी विरोध के चलते चिदंबरम ने अपने दूसरे बयान में कहा- मैं भी बाहर से आया हूं, मेरे बयान को तोड़ मरोड़ कर पेश किया गया। वाह चिदंबरम साहब दिल्ली में पूरे भारत से लोग आते हैं और देश की राजधानी पर पूरे देश का हक है। राजधानी की सुरक्षा क्या केवल विदेशियों के लिए है जो कि सिर्फ कॉमनवेल्थ में ही दिखाई पड़ी थी। क्या राजधानी के लिए सुरक्षा के नियम इतने सख्त नहीं होने चाहिए कि परिंदा भी पर ना मार सके। लेकिन आप तो उलटे जनता पर ही चढ़ गए।राजधानी में सुरक्षा तंत्र बूढ़ा हो चुका और टूटी खाट पर लेटकर पानी मांग रहा है। लगातार हो रहे गैंगरेप,मर्डर चोरियों से दिल्ली पुलिस के काम करने के तरीके पर सवालिया निशान लगा दिया है ऐसे में कोई आतंकी हमला हो जाता है तो कोई बड़ी बात नहीं होगी। इससे पहले भी दिल्ली की मुख्यमंत्री और शीला दीक्षित और राज्यपाल तेंजेंदर खन्ना भी गृह मंत्री जैसे ही बयानों की दौड़ में शामिल हो चुके हैं।

क्या देश का कानून ऐसे जिम्मेदार मंत्री और नेताओं के खिलाफ कुछ नहीं कर सकता। क्या ऐसे बयानों पर इनके खिलाफ कानूनी कार्यवाही नहीं करनी चाहिए। लेकिन सरकार को देश की एकता और अखंडता से लगाव नहीं और ना ही शासन चलाने की मंशा तभी तो हुर्रियत नेता गिलानी और अरूंधति रॉय के कश्मीर पर दिए देश विरोधी बयानों में सरकार को कुछ गलत दिखाई नहीं दिया। वहीं अफजल गुरू की फाइल लटका कर उसे फांसी पर लटकने नहीं दे रही है।

अब ये तस्वीर बिल्कुल साफ हो चली है कि सरकार नाकारा है। सत्ता में बने रहने के लिए आम लोगों की बलि चढ़वा रही है। अपनी अक्षमता से सरकार ने विपक्ष एकजुट होने में खूब मदद की है जो सरकार को किसी भी मुद्दों पर पछाड़ने के लिए तैयार बैठी है। इन नेताओं के बयानों से कहीं इतने हालात न बिगड़ जाएं कि ये दशकों तक सत्ता को सुख न भोग पाए। राजनीति के इन महान नेताओं देश की जनता का अपमान का कोई हक नहीं बनता ऐसे नेता दोबारा सत्ता में न आ पाए जिसके लिए हम,आपको ही प्रयास करने होंगे।

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Thursday, December 2, 2010

क्या सत्ता के दलाल बनते जा रहे हैं पत्रकार?

2:23 PM

बुरे फंसे प्रभु, वीर और बरखा

लोकतंत्र का चौथे स्तंभ पत्रकारिता में गुंडे तो पहले से थे ही अब दलाल भी घुस गए हैं। अधिकतर मीडिया समूह अब दलाली का अखाड़ा बन गए हैं। ऐसा कुछ दिनों पहले कॉरपोरेट घरानों के लिए काम करने वाली नीरा राडिया के साथ अख़बारों और टेलिवीज़न के नामचीन पत्रकारों की बातचीत के टेप प्रकाशित किए गए थे जिनमें ये पत्रकार डीएमके के नेता . राजा को मंत्रिमंडल में शामिल करवाने की पैरवी करते नज़र आए या फिर अंबानी बंधुओं के झगड़े में पक्ष लेते नज़र आए। ये सभी मीडिया के मठाधीश माने जाते हैं जिनकी बातों पर लोग आंखें मूंदकर विश्वास कर लते हैं, इन टेपों से मीडिया जगत में सनसनी मची हुई है, जिनके नाम इन टेप में आए है जिनमे प्रमुख रूप से प्रभु चावला आजतक से, वीर सांघवी, एचटी मीडिया और एनडीटीवी की पत्रकार बरखा दत्त शामिल हैं।
 
रतन टाटा क्यो छिपा रहे हैं राडिया के राज
कॉरपोरेट घरानों की दलाली के आरोपों के चलते पूरे मीडिया जगत को शक की नजर से देखा जाने लगा है। नीरा राडिया ने .राजा को मंत्री बनने के लिए लॉबिंग कराए जाने के पीछे क्या मकसद था हजारों करोड़ के घोटाले के बाद ये पता चल ही गया। कॉरपोरेट घरानों में नाम आने से टाटा और अंबानी की भी फजीहत हुई है, राडिया के साथ टेप का खुलासा होने के बाद आखिर रतन टाटा इतना बौखलाए क्यों घूम रहे हैं, टेप में ऐसा क्या है जिसने रतन टाटा की नब्ज पकड़ ली है। फिलहाल 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है जहां सुप्रीम कोर्ट ने प्रधानमंत्री और .राजा समेत सरकार को बचाने वाली सीबीआई को कटघरे में खड़ा कर दिया। अपनी तीखी टिप्पणियों में कोर्ट ने कहा- सरकार भ्रष्टाचार पर काबू करने में नाकाम है। सरकार की भ्रष्टाचारी पॉलिसी किस हद तक कारगर साबित हो रही है इसका अंदाजा इसी बात से हो गया जब उसने भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे पीजे थॉमस को पहले तो सीवीसी बनाया, लेकिन जब बात 2जी स्पेक्ट्रम मामले की जांच की आई तो विरोध के बाद थॉमस को घोटाले की जांच से बाहर कर दिया। वाह री सरकार...अब सीवीसी जैसे पदों पर बैठे लोग भी खाएंगे और खिलाएंगे

राजा तूने क्या किया, मुझे ही ले डूबा

भ्रष्टाचार का सरकारी नंगापन इस हद तक बढ़ गया है कि सरकार बचाने के लिए सत्ता मोही कांग्रेस पार्टी देश को बेचने के लिए तैयार बैठी है। फिर चाहे वह आदर्श सोसायटी घोटाला हो, कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाला हो या फिर 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला, सरकार भरी बैठी है हर किसी को एक मौके जरूर दे रही है। लेकिन मीडिया में मचा हडकंप इस बार जल्द शांत होते नहीं दिखता। पत्रकारों की मांग है कि भ्रष्टाचारी राजा का साथ देने वाले वरिष्ठ पत्रकारों की पूरी सच्चाई देश के सामने जरूर आनी चाहिए ताकि इस प्रोफेशन से गुंडे और दलालों की विदाई हो सके। इस विवाद के बाद सबसे बड़ा सवाल ये उठने लगा है कि क्या पत्रकार सत्ता को आइना दिखाने और उसे सच की कसौटी पर कसने की बजाए सत्ताधीशों के लिए बिचौलिए का काम करने लगे हैं? जो पत्रकार समाज तक सच पहुँचाने का दावा करते हैं वो अगर उद्योगपतियों और नेताओं के लिए संदेशवाहक का काम करने लगेंगे तो क्या जनता आज़ाद प्रेस पर भरोसा बरकरार रख पाएगी?

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