Thursday, August 12, 2010
Categorized | राजनीति
ममता का 'लाल' सलाम
11:42 PM
पश्चिम बंगाल में अगले साल विधानसभा चुनाव होने ऐसे में ममता बनर्जी ने चुनावी तैयारियां शुरू कर दी हैं।नक्सलियों के गढ़ 'लालगढ़' में ममता बनर्जी ने रैली करके कांग्रेस और वामपंथियों को अपनी ताकत का नजारा दिखा दिया। रैली तृणमूल की थी लेकिन रैली में जनान्दोलनों के सबसे बड़े नेता या कहें नक्सल समर्थकों को विशेष रूप से आमंत्रित किया गया। रैली में स्वामी अग्निवेश,मेधा पाटकर और महाश्वेता देवी जैसी बुद्धिजीवियों ने शिरकत की। बंगाल की गद्दी पर बैठने का सपना संजोए ममता बनर्जी को रैली में नक्सलियों का खुला समर्थन मिला,नक्सली समर्थक संगठन पीसीएपीए के कई कार्यकर्ता भी रैली में शामिल हुए।
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| रैली में ममता ने नक्सली नेता आजाद की मौत पर सवाल उठाए |
ममता बनर्जी ने रैली में माओवादियों के प्रति खूब सहानुभूति दिखाई। ममता ने लालगढ़ रैली में कहा- 'नक्सली हिंसा का रास्ता छोड़ें और सरकार से बातचीत के लिए आगे आएं। हम उनकी बात सुनेंगे, राज्य सरकार नक्सलवाद को कुचलने के नाम पर लोकतांत्रिक मूल्यों को कुचल रही है. इसी के विरोध में ये रैली है' । ममता ने मुठभेड़ में मारे गए नक्सली नेता आजाद की हत्या को गलत ठहराया। माओवादी नेता किशनजी ने ममता की रैली को पूरा समर्थन दिया और कई पीसीएपीए नेता रैली में मौजूद दिखे।
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| ममता की रैली में इस भीड़ का मतलब क्या वामपंथियों का सफाया है |
ममता की रैली में मेधा पाटकर ने अपने तल्खी भरे शब्दों से केंद्र को सूचित किया कि सरकार को भूमि अधिग्रहण के तौर तरीके बदलने होंगे। चंद लोगों को मुनाफा देकर सरकार विकास की बातें कर रही है। अब ये बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। वहीं नक्सलियों के सबसे बड़े समर्थक स्वामी अग्निवेश ने कहा "जब तक ग्रामीण आदिवासियों की जमीनों पर कब्जे बंद नहीं होंगे लड़ाई जारी रहेगी चाहे वह बंदूक से हो या शांति से। नक्सलियों की लड़ाई स्वाभिमान की लड़ाई है। लालगढ़ की रैली में इन अपने भड़काने वाले भाषणों से नक्सलियों का मनोबल और बढ़ा है।
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| मेधा पाटकर के साथ स्वामी अग्निवेश |
पश्चिम बंगाल में लोकसभा चुनाव में टीएमसी की भारी सफलता के बाद निकाय चुनाव में पार्टी ने झंडे गाड़े। पार्टी की इस जीत से ममता को अपना बंगाल पर कब्जे का अपना सपना सच नजर आता दिखने लगा।कोलकाता से रेल मंत्रालय चलाने वाली ममता बनर्जी ने अपनी जिद को हमेशा प्राथमिकता दी। सिंगूरमें आदिवासियों के जमीन के लिए ममता ने एक लंबी लड़ाई लड़ी। ममता की वजह से टाटा को
जाना पड़ा और हजारों लोगों के पेट पर लात मारकर ममता बनर्जी ने साबित कर दिया कि वह सत्ता को हासिल करने के दाव पेंच सीख गई हैं।लेकिन क्या लालगढ़ को सिंगूर की तरह भुनाना चाहती है ममता। सिंगूर में आदिवासियों की लड़ाई थी लेकिन यहां नक्सलवाद राष्ट्रव्यापी लड़ाई है।
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| लगातार जारी हैं नक्सलियों के हमले |
नक्सलियों पर सरकार द्वारा चलाए जा रहे ऑपरेशन ग्रीन हंट में सैकड़ों सुरक्षाबलों की मौत हो चुकी है। नक्सलियों की इन आतंकी घटनाओं के बाद भी ममता के मुंह से कभी भी उन जवानों के परिवारों के लिए दो शब्द नहीं फूटे। लेकिन लालगढ़ की रैली में नक्सली नेता आजाद के मारे जाने पर ममता ने सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया यही नहीं ममता ने नक्सली नेता आजाद की मौत की जांच करवाने तक की बात कह दी।
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| गरीबों को सपने दिखाते नक्सली |
नक्सलियों ने कई बार ट्रेनों को निशाना बनाया,जिसमेंसैकड़ों यात्रीमारे गए,लेकिन ममता ने नक्सलियों का पक्ष लिया और कर्मचारियों पर ही सवाल उठाए। ममता दीदी का ये नक्सली प्रेम कई लोगों को खटक रहा है।। कई राज्यों में आए दिन बड़ी वारदातें करने वाले नक्सलियों से देश में आतंक और भय का महौल बना हुआ है ऐसे में लालगढ़ में रैली को एक चुनावी का चुनावी स्टंट ही है।्,जिस बात की लड़ाई वे लड़ रहे हैं उससे उनकी नीतियां कोसो दूर चली है। नक्सलियों के घिनौनापन अपने चरम पर है।
नक्सलियों को अपने इतना करीब कर लेने वाली ममता के लिए ये राह भी आसान नहीं है ममता वामपंथी पार्टियों और केंद्र सरकार के लिए आंख की किरकिरी बनती जा री रही हैं। वाम दलों का कहना है ममता सिर्फ वोट बैंक की राजनीति कर रही हैं उन्हें बंगाल की जनता पर भरोसा नहीं है। इसलिए ममता नक्सलियों के दम पर चुनाव में उतरने की सोच रही हैं। सत्ता का स्वाद चखने के लिए नक्सलियों को साथ लेना चाहती हैं ममता। कहा ये भी जा रहा है सत्ता में आने के बाद नक्सलियों को ठेंगा दिखा देंगी। सीपीएम के मुताबिक नक्सलियों और ममता के बीच सांठगांठ अब साफ दिख चुकी है। वामपंथियों ने केंद्र सरकार से अपना रुख साफ करने को कहा है।केंद्र माओवादियों के खिलाफ आए दिन नई रणनीति बना रहा है, लेकिन अब उसकी प्रमुख सहयोगी पार्टी ही नए नक्सलियों का समर्थन कर रही है। लालगढ़ में यह रैली कांग्रेस और तृणमूल को मिलकर करनी थी।लेकिन आखिरी वक्त में कांग्रेस ने अपने हाथ वापस खींच लिए। कांग्रेस को डर है कि कहीं विपक्षी पार्टियां इसे सत्ताधारी पार्टी की नाकामी न बताए। यह सब ऐसे वक्त में हो रहा है जब सुरक्षाकर्मियों पर माओवादियों के बड़े हमले हो चुके हैं।ममता लंबे समय से राजनीति में हैं लेकिन लालगढ़ में ममता का ये लाल सलाम मतभेदों कम करने में सहायक तो कतई नहीं था।सत्ता को सुख किस नेता को प्यारा नहीं होता है। लेकिन सत्ता के लिए देशद्रोहियों से हाथ मिलाना कहां तक जायज है।
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2 Responses to “ममता का 'लाल' सलाम”
August 14, 2010 at 2:45 AM
एक दिन इस देश का ही लाल सलाम हो जायेगा। ये नेता छोटे फायदे के लिये बडे समझौते करते हैं। मेधा अरुन्धति अपना सम्मान खो ही चुकी है माफ कीजियेगा अग्निवेश जी आप भी उसी राह पर चल कर अपनी विश्वसनीयता खोते जा रहे हैं।
August 15, 2010 at 9:28 AM
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स्वतंत्रता दिवस के मौके पर आप एवं आपके परिवार का हार्दिक अभिनन्दन एवं शुभकामनाएँ !
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