Tuesday, August 31, 2010
आतंकवाद का बंटवारा !!
4:02 PM
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| गृहमंत्री का बयान- भारत में भगवा आतंकवाद फैल रहा है |
भारत के लोगों ने कई बंटवारे देखे है, पहले देश को 2 भागों में बंटता हुआ देखा, फिर राज्यों के कई टुकड़े होते हुए देखे, फिर आरक्षण की आग से युवाओं के दिलों को बंटते हुए देखा। लेकिन अब एक नया बंटवारा सामने आया है,आतंकवाद का बंटवारा। बात ज्यादा पुरानी नहीं है मालेगांव और समझौता एक्सप्रेस धमाकों समेत कुछ अन्य वारदातों में कुछ संगठनों के शामिल होने की बात सामने आई थी। कुछ लोगों ने इसे हिंदू आतंकवाद का नाम दिया था। आतंकवाद के कई स्वरूप और नाम सामने आ रहे हैं। ऐसे में आतंकवाद का इंडेक्स बनाना सरकार की जिम्मेदारी थी और इसको सरकार के मंत्री बखूबी निभा रहे हैं।
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| आतंकवाद को रंगों, धर्मों से जोड़ना कितना सही है? |
बात करें देश के गृह मंत्री पी चिदंबरम की तो उनका ये बयान, ‘‘भारत में युवकों और युवतियों को कट्टर बनाने के प्रयास बंद नहीं हुए हैं। हाल ही में हुए कई बम विस्फोटों से भगवा आतंकवाद का नया स्वरूप सामने आया है।’’ पर हंगामा बरपा हुआ है जो रुकने का नाम ही नहीं ले रहा। देश का गृह मंत्री जब अपनी वाक् बुद्धि छोड़ कर ऐसे बयान देने लग जाए तो देश का ध्रुवीकरण की ओर जाना तय सा लगता है। चिदंबरम के भगवा आतंकवाद पर बयान की चौतरफा आलोचना हो रही है। बीजेपी, शिवसेना समेत कई दलों ने इस मुद्दे पर लोगसभा की कार्यवाही मे २ दिनों तक अड़ंगा डाला और कड़ा विरोध सरकार जताकर प्रधानमंत्री से माफी मांगने तक की बात कह दी। इस मु्द्दे पर गुजरात में चिदंबरम के खिलाफ केस भी दर्ज कराया गया है।
भारत की आजादी का प्रतीक रहा केसरिया रंग को आज आतंकवाद का रंग कहकर उन शहीदों का अपमान किया है जिन्होंने देश के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। हालांकि चिदंबरम के इस बयान पर कुछ लोगों का मानना है कि चिदंबरम साहब ने ये सब किसी के विशेष व्यक्ति के कहने पर बोला है। बढ़ते भ्रष्टाचार और महंगाई कम न कर पाने का मलाल कर रही सरकार के असली मुद्दे जैसे कॉमनवेल्थ,नक्सल समस्या आदि से विपक्ष को भटकाना चाहती है। लेकिन कुछ राजनीतिक दलों ने चिदंबरम की टिप्पणी को सही ठहराया। ये वही दल है जो कहते रहते हैं आतंकवाद को किसी मजहब या किसी समुदाय से नहीं जोड़ा जाना चाहिए।
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| भारत में बेरोजगारी, भुखमरी दे रही है आतंकवाद को बढ़ावा |
किसी मंत्री ने बयान दिया और कांग्रेस ने बयान से पल्ला झाड़ लिया, ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। अपने मंत्रियों के बयानों से शर्मसार होती रही कांग्रेस के लिए अब ये आम बात या कहें मजबूरी बन चुकी है। “आतंकवाद का कोई रंग नहीं होता,शब्दों के चयन का ख्याल रखना चाहिए”। कांग्रेस नेता जनार्दन द्विवेदी ने ये बयान देकर चिदंबरम के बयान पर कांग्रेस की आपत्ति दर्ज करा दी। लेकिन सरकार के वरिष्ठ मंत्री को ऐसा बयान देने की आखिर क्या मजबूरी रही होगी। क्या देश की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था की समस्या इतनी गंभीर होती जा रही है जिससे चिदंबरम साहब खुद डर गए है।
नेताओं का राजनीतिक बयानबाजी न करना अपने पेशे से खिलाफत करने जैसा है। नेताओं के लिए आज देश से बढ़कर वोट बैंक राजनीति है। इसलिए समय समय पर वे विवादास्पद बयान देते रहते हैं।लेकिन मंत्रियों का ऐसा करना कहां तक उचित है, आतंकवाद को धर्मों और रंगों से जोड़ना कितना सही है?आतंकवाद की किसी भी चीज से तुलना करना सूक्ष्म मानसिकता का परिचायक है। आतंकवाद को बांटने वाला चिदंबरम का ये बयान कम से कम आतंकवाद या कट्टरवाद को रोकने में तो सफल नहीं हो सकता।
Sunday, August 15, 2010
35 साल के 'शोले'
5:01 AM
15 अगस्त 1975 को रिलीज हुई फिल्म "शोले" को प्रदर्शित हुए आज 35 साल हो गए। साढ़े तीन दशक का लंबा समय बीत जाने के बाद भी शोले के गब्बर, जय, वीरू और बसंती का जादू अब भी बरकरार है। शोले ने आज भी भारतीय जनमानस में अपनी छाप गहराई तक छोड़ रखी है। कितनी ही फिल्में आईं लेकिन आम दर्शकों से लेकर फिल्म विशेषज्ञों के जेहन से 35 साल बाद भी ‘शोले’ ही निकलती ही नहीं। देश के लोगों के दिल में बसी इस फिल्म के डायलॉग्स को आज भी अपनी बातों में शामिल करते हैं और छोटे से छोटा किरदार भी विज्ञापनों, प्रोमो, फिल्मों या धारावाहिकों में नजर आ जाता है।
निर्देशक रमेश सिप्पी की अविस्मरणीय फिल्म शोले के गब्बर, जय, वीरू और बसंती का जादू अब भी बरकरार है। फिल्म शोले में 2 दोस्तों की कभी न खत्म होने वाली दोस्ती, एक विधवा का खामोश प्यार। एक तांगे वाली का बड़बोलापन। एक आदर्शवादी पुलिस अफसर का संघर्ष। एक डाकू की दिखाई गई हकीकत लोगों के दिलों मे आज भी बसी हुई है।
संजीव कुमार, अमिताभ बच्चन, धर्मेंद्र, जया भादुड़ी, हेमामालिनी ने जो अदाकारी की है वो आज किसी फिल्म में देखने को नहीं मिलती।इसी फिल्म से अमजद खान जैसे नए अभिनेता की एक खास पहचान बनी। वह हिंदी सिनेमा में एक सबसे प्रख्यात खलनायक बन गए। फिल्म बनने से पहले अमजद खान इस रोल के लिए दूसरे विकल्प के तौर पर थे। निर्माता गब्बर के किरदार के लिए डैनी डेंग्जोपा को लेना चाहते थे लेकिन डैनी व्यस्त थे। अंत में फिर अमजद खान को ही ‘गब्बर’ के लिए चुना गया। फिल्म में असरानी,जगदीप और एक संवाद बोलने वाले मैकमोहन भी लोगों की यादों में बस गए। शोले में जगदीप ने सूरमा भोपाली का किरदार निभाया था जो आज भी दर्शकों को ठहाके लगाने पर मजबूर कर देता हैं। शोले में ए.के.हंगल से लेकर कालिया बने विजु खोटे ने अपने अभिनय से लोगों का दिल जीता। फिल्म में “तेरा क्या होगा कालिया डायलॉग” आज भी बड़ा लोकप्रिय है। यही नहीं शोले में केवल एक संवाद बोलने वाले मैकमोहन ने फिल्म में अपनी अमिट छाप छोड़ी जिसे कोई भुला नहीं सकता।
फिल्म में जेलर का किरदार निभाने वाले असरानी ने अग्रेजों के जमाने की खूब याद दिलाई। दर्शकों ने असरानी के रोल को खूब पसंद किया। असरानी को बाद कई फिल्मों इसी तरह के रोल करते नजर आए। शोले में जेल में सुरंग बनाने वाले सीन में दर्शकों को हंस हंस कर लोटने पर मजबूर ही कर दिया था।
| सूरमा भोपाली बने जगदीप और अग्रेजों के जमाने के जेलर असरानी की जबर्दस्त कॉमेडी |
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| शोले के निर्देशक रमेश सिप्पी |
फिल्म को शुरूआत में फिल्म आलोचकों ने नकार दिया। लेकिन शोले की सफलता ने आलोचकों का मुंह बंद कर दिया। फिल्म की शूटिंग जिस गांव में हुई थी, गांववालों ने उसका नाम सिप्पीनगर रख दिया था। वर्ष 2006 में आयोजित 50वें फिल्मफेयर अवॉर्ड में इसे ‘बेस्ट फिल्म ऑफ 50 ईयर्स’ का अवॉर्ड मिला था। इस फिल्म को बीबीसी ने भी ‘फिल्म ऑफ द मिलेनियम’ घोषित किया था। शोले एक कम्पलीट फिल्म थी। इसमें हंसी-मजाक, ड्रामा, एक्शन और लव स्टोरी सबकुछ था। यह तो परिवार के साथ ही देखने लायक भरपूर आनंद से लबरेज फिल्म रही है। इसकी खासियत इसकी स्क्रिप्ट थी जो हर मोमेंट पर अलग ही रोमांच देती है। यदि इन ३५ सालों की बात करें तो मुझे नही लगता कि शोले से किसी भी फिल्म की तुलना की जा सकती है। शोले सर्वश्रेष्ठ फिल्म थी, है और रहेगी।
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