Wednesday, August 19, 2009

जिन्ना को जसवंत की बलि....

12:26 PM


जब किसी संस्थान या किसी व्यक्ति को उसके भविष्य की चिंता सताती है तो उनमें कई परिवर्तन होना है जरुरी हो जाता है। लेकिन क्या आप जानते है जब किसी राजनीतिक पार्टी को उसके भविष्य की चिंता सताती है तो क्या होता है? वही होता है जो बीजेपी का हो रहा है। भारतीय जनता पार्टी देश की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी आज अपने भविष्य को लेकर बहुत चिंतत है। इसी लिए वह श्रषि मुनियों का फंडा अपनाते हुए पहाड़ों पर शिमला में चिंतन बैठक कर रही है। पार्टी सचमुच एक बहुत बुरे दौर से गुजर रही है। कई राज्यों की विधानसभा फिर और फिर लोकसभा चुनाव में हार के बाद, पार्टी के अंदरुनी कलह बीजेपी से पार्टी सेंसेक्स भारी गिरावट के तरह नीचे आ रही है।हाल के ताजा विवाद देखें तो राजस्थान में महारानी इस तरह अड़ गई जैसे पार्टी उनके लिए कुछ है ही नहीं। वसुंधरा राजे ने विपक्ष के नेता के पद से इस्तीफा देने से इनकार कर दिया। लेकिन शायद वे जानतीं थीं बिना बीजेपी उनका अब कोई वजूद नहीं है इसलिए २ दिन बाद मान गईं। लेकिन बीजेपी के हनुमान ने अपनी लिखी किताब रूपी पूंछ में ऐसी आग लगाई की अपनी के पार्टी को जला दिया। मैं बात कर रहा हूं जसवंत सिंह की, बीजेपी के दार्जिलिंग से सांसद और समय समय पर बीजेपी के संकटमोचक रहे जसवंत सिंह जिन्ना को बलि चढ़ ही गए। बीजेपी ने उन्हे निलंबित कर दिया। शिमला में चिंतन बैठक के पहले ही दिन पार्टी के संसदीय बोर्ड ने ये फैसला किया। ऐसा जसवंत सिंह की किताब में सरदार पटेल की आलोचना करने पर किया गया है। बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने इसकी घोषणा की। जसंवत सिंह ने दो दिन पहले अपनी किताब 'जिन्ना इंडिया पार्टीशन इंडिपेंडेंस' के विमोचन पर कोई बीजेपी नेता न पहुंचने के बाद यह तय हो गया था कि सच का सामना या कहें जसवंत की किताब का सामना बीजेपी नहीं कर पाएगी और हुआ भी । जसवंत सिंह बीजेपी में एक प्रमुख स्थान रखते थे। निष्कासन के बाद जसवंत सिंह ने प्रेसवार्ता में कहा- मैं दुखी हूं की पार्टी ने मुझे केवल एक किताब लिखने मात्र से मुझे निकाल दिया, मुझे हनुमान से रावण बना दिया। ये जो बात जसवंत सिंह ने कही उससे साफ झलकता है की बीजेपी में अब तानाशाही शुरू हो चुकी है। क्या बीजेपी अपने नेताओं का पढ़ना लिखना और बोलना भी बंद कराने वाली है। बुद्धिजीवियों की पार्टी कही जाने वाली बीजेपी में आज अभिव्यक्ति स्वतंत्रता का मतलब निष्कासन हो गया है। तो आप ही सोचकर बताईए एसी पार्टी क्या देश को चलाएगी। जसवंत सिंह की किताब को शायद ही किसी बीजेपी नेता ने पढ़ी हो. और अब उसे शायद ही पढ़े। गुजरात में जसवंत की किताब पर बैन लगा दिया गया है, क्या बीजेपी अपने अंत से डर गई है जो अनुशासन का चाबुक बताकर वरिष्ठ नेताओं को पार्टी से इस तरह तानाशाही से निकाल रही है या फिर पार्टी में चल रही उठा पटक को एक झटके में बंद करने के लिए ऐसा फैसला लिया गया है। भारत के विभाजन की विभिषिका को सुनने और जानने में आज के युवा शायद ही रुचि रखते हों लेकिन बुद्धिजीवियों और राजनीति से सरोकार रखने वाले लोगों द्वारा लिखी गई किताबों में समय- समय बंटवारे के अनछुए पहलुओं पर रोशनी डालती रहती है। लेकिन क्या इसका मतलब ये है कि बीजेपी के वरिष्ठ नेता जसवंत सिंह को पार्टी से निकाल दिया जाए। इससे पहले पाकिस्तान गए बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष लाल कृष्ण आडवाणी ने जिन्ना सेकुलर बताकर बीजेपी में भूचाल ला दिया था। लेकिन वे पार्टी के मोस्ट सीनियर नेता होने के कारण बच गए। लेकिन जसंवत सिंह को यह मौका पार्टी ने नहीं दिया। तो क्या लालकृष्ण आडवाणी पर भी इसी तरह की सजा का प्रावधान नहीं होना चाहिए था। लंदन स्कूल ऑफ एक्नोमिक्स के वरिष्ठ प्रोफेसर ने कहा कि जसंवत की किताब जिन्ना पर है लेकिन उन्होंने पार्टीशन के लिए सभी की आलोचना की है चाहे वह पटेल हों या नेहरु। किताब में उन अनछुए पहलुओं पर नजर डाली गई जो शायद ही कोई नेता कह पाता। बीजेपी में वर्चस्व की लड़ाई और कार्यकर्ताओं में घोर निराशा साफ दिख रही है। पार्टी को एक किताब से ४ राज्यों में होने वाले चुनावों पर असर दिखा होता दिखा और जसवंत सिंह पर गाज गिर गई। बीजेपी अपने नेताओं और वरिष्ठ बुद्धिजीवियों का इस फूहड़ ढंग से निकाल रही है तो पार्टी के भविष्य अब भगवान भरोसे है। जसवंत एक संकेत हैं अरुण जेटली, यशवंत सिन्हा, अरुण शौरी के लिए, लेकिन बीजेपी के इस कदम से ऐसा नहीं लगता की आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत की कही बात " बीजेपी को जवान बनना होगा, पार्टी की कमान किसी युवा को मिलनी चाहिए"।शायद ही सच हो पाए।

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Tuesday, August 18, 2009

लौट के बुद्धु शाहरुख घर को आए..........

3:30 PM

देश अपनी स्वतंत्रता की 63वीं वर्षगांठ मना रहा था। वैसे कई लोग अब १५ अगस्त को एक छुट्टी के दिन के अलावा कुछ नहीं मानते, ये दिन उनके लिए मस्ती और घूमने-फिरने के लिए होता है। बस ये बात हम मीडिया वालों पर फिट नहीं होती और इस दिन उन्हें एक एक बड़ी खबर की दरकार रहती सो उन्हे वो खबर उन्हें मिल गई और खबर भी ऐसी की सारा देश टीवी के सामने बैठ गया। चैनल्स ने देश की आजादी की खबरों से अपनी खबरें हटाकर ब्रेकिंग न्यूज शुरू कर दी... "शाहरुख खान के साथ अमेरिका के नेवार्क एयरपोर्ट पर बदसलूकी"। अमेरिका में कुछ दिन पहले पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम के साथ भी कुछ एसा ही हुआ था। लेकिन अब ये किंग खान के साथ हुआ है... बॉलीवुड के किंगखान को अमेरिका के नेवार्क एयरपोर्ट पर रोकने के बाद अमेरिकी पुलिस अधिकारियों द्वारा पूछताछ की घटना पर देशभर के लोगों की प्रतिक्रिया आई,,,, लोगों ने अपनी नाराजगी जताई, अपने प्रोफेसनल दुश्मन सलमान खान की टिप्पणी की। अमेरिका से न्यूज चैनल्स को फोनो दे-देकर शाहरुख ने भी अपनी भड़ास निकाली, बकौल शाहरुख " किसी दूसरे से नाम मिलने की वजह से मुझे रोका गया मुझे एक कमरे में ले जाया गया जहां कई लोग मौजूद थे मैंने बार-बार अधिकारियों से कहा कि मैं एक फिल्म एक्टर हूं और मुझे फोन पर बात करने की इजाजत दी जाए लेकिन उन्होंने मना कर दिया" तीन दिन बाद १८ अगस्त को अमेरिका से वापस लौटे शाहरुख खान ने अपने घर मन्नत में इसी मामले को लेकर पत्रकारों की फुल पैक्ड कॉन्फ्रेंस बुलाई... और फिर राजनीति शुरू हो गई। इसी मसले पर कई राजनीति लोगों से कुछ मीडिया वालों राय मांगी, बस फिर क्या था, समाजवादी पार्टी के नेता अमर सिंह ने बोल बैठे शाहरुख खान पर, बकौल अमर सिंह.. शाहरुख ने ये सब अपनी फिल्म के प्रचार के लिए किया है।अमर सिंह आजकल सिंगापुर में अपना इलाज करा रहे हैं। अमर सिंह के बयान पर शाहरुख ने किया पलटवार और कहा अमर सिंह को और इलाज की जरुरत है, खैर शाहरुख खान एक अभिनेता हैं और अमर सिंह भी एक अभिनेता है, एक लोगों का मनोरंजन करके पैसा कमाता है। दूसरा अपने अंदाज-ए-बयां से मीडिया को मसाला देता है, जिससे खबरों को पढ़ने की रोचकता बनी रहती है। अगर मैं कुछ कहूं तो हमारे देश में अब मीडिया तय करने लगा है कि किसको, कहां, और कैसे दिखाया जाए। मुझे एक वाकया याद आता है, भारत के एक पूर्व राष्ट्रपति के निधन की खबर भी एक पूर्व डिप्टी सीएम की प्रेम कहानी की खबरों के आगे बेकार हो जाती हैं। अब शाहरुख खान लौट आए और कह रहें है अब न जाऊंगा अमेरिका। भई हम को यही कहते शाहरुख भाई आप अमेरिका जरुर जाएं लेकिन उनके कायदे कानून को यूं तामाशा न बनाएं। सभी पाठकों को स्वतंत्रता के 63वें वर्ष के लिए शुभकामनाएं। जय हिंद।

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चुप्पी साध गए पीएम........... सिंह

2:02 PM

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने देश की आजादी की 63वीं सालगिरह पर लाल किले पर तिरंगा फहराया इस मौके पर प्रधानमंत्री ने कई घोषणाएं की सरकार के कामकाज के बारे में बताया फ्यूचर प्लानिंग भी बतायी आतंकवाद पर भी बोला लेकिन विपक्ष को ये बात अखर गयी की प्रधानमंत्री ने भारत-पाक साझा बयान पर कुछ बात क्यों नहीं की जिस पर पिछले दिनों खूब हंगामा भी हुआ था लाल किले से देश को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह आतंकवाद के मुद्दे पर बेहद सख्त नजर आए उन्होंने देशवासियों को भरोसा दिलाया कि किसी भी कीमत पर आतंकवाद को जड़ से खत्म किया जाएगा उन्होंने इसके लिए खुफिया तंत्र के साथ साथ सुरक्षा बलों को बेहतर बनाने की जरुरत पर जोर दिया प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में मुंबई हमले का जिक्र तो किया, लेकिन भारत-पाकिस्तान के साझा बयान पर चुप्पी साध गए प्रधानंमत्री मनमोहन सिंह की इस चुप्पी ने विपक्ष को निशाना साधने का एक मौका दे दिया विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी ने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री साझा बयान पर कोई जवाब देने नहीं चाहते। शर्म अल शेख मामले पर पाकिस्तान अपनी विजय मान रहा है, क्या है आखिर शर्म अल शेख का सच, क्या वास्तव में सरकार की वो एक बड़ी गलती थी। विपक्ष इस हमले एक बार फिर साबित कर दिया है कि शर्म अल शेख में दिए गए साझा बयान को लेकर मनमोहन सिंह की मुश्किलें आगे भी खत्म होनेवाली नहीं है।

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Friday, August 14, 2009

........और वो नहीं कर पाया सच का 'सामना'

1:16 PM



एक टीवी चैनल पर आने वाले शो 'सच का सामना' देखने वाला एक शख्स अपनी लाइफ के सच का सामना नहीं कर सका और सदमे में फांसी लगाकर जान दे दी। प्रोग्रैम देखकर एक्साइटमंट में उसने पत्नी से अपने सच का खुलासा करने को कहा, लेकिन सच को वह सहन नहीं कर सका। वह और उनकी पत्नी टीवी पर सच का सामना रेगुलर देखते थे। पत्नी ने पहले इससे इनकार किया, लेकिन अपनी कसम पति ने पत्नी को मना ही लिया। उन्होंने पत्नी को यकीन दिलाया कि सच जैसा भी हो, वह उसे मंजूर करेंगे और पत्नी को उतना ही प्यार करेंगे। भरोसे में आई पत्नी ने पति को बता दिया कि शादी से पहले उन्होंने अपने प्रेमी से शारीरिक संबंध बनाए थे। यह सुनकर पति को गहरा सदमा लगा। अगले दिन पति ने पत्नी की चुनरी का फंदा बनाया और खिड़की की ग्रिल के सहारे फांसी लगा कुछ ऐसी बातें होती हैं जिन्हें रहस्य रखना ही बेहतर होता है। कई बार इनके खुलने से लोगों के जीवन में भूचाल आ जाता है। लेकिन टीआरपी के इस खेल अब ऐसे प्रोग्राम घर भी उजाड़ने लगे है। अगर सरकार ने जल्द कोई कदम नहीं उठाया तो शायद और कई जान ली लेगी।

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